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मई की निर्वाचित पुस्तक
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सप्ताह की पुस्तक
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स्वदेश रवीन्द्रनाथ टैगोर के चुने हुए निबन्धों का हिन्दी अनुवाद है। इसका प्रकाशन हिन्दी-ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, (बम्बई) द्वारा १९१४ ई॰ में किया गया था।

हम पुराने भारतवर्ष के लोग हैं; बहुत ही प्राचीन और बहुत ही थके हुए हैं। मैं बहुधा अपने में ही अपनी इस जातीय भारी प्राचीनता का अनुभव किया करता हूँ। मन लगाकर जब अपने भीतर नजर डालता हूँ तब देखता हूँ कि वहाँ केवल चिन्ता, विश्राम और वैराग्य है। मानों हमारी भीतरी और बाहरी शक्तियों ने एक लम्बी छुट्टी ले रक्खी है। मानों जगत् के प्रातःकाल ही में हम लोग दफ्तर का कामकाज कर आये हैं, इसीसे इस दोपहर की कड़ी धूप में, जब कि और सब लोग कामकाज में लगे हुए हैं हम दर्वाजा बंद करके निश्चिन्त हो विश्राम या आराम कर रहे हैं; हमने अपनी पूरी तलब चुका ली है और पेंशन पा गये हैं। बस, अब उसी पेंशन पर गुजारा कर रहे हैं। मजे में हैं।...(पूरा पढ़ें)


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पूर्ण पुस्तक
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चोखे चौपदे अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के खड़ी बोली के हजार चौपदों का संग्रह है। इसका प्रकाशन "खड़गविलास प्रेस", (पटना) द्वारा १९२४ ई॰ में किया गया था।

जो किसी के भी नहीं बाँधे बँधे ।
प्रेमबंधन से गये वे ही कसे॥
तीन लोकों में नही जो बस सके।
प्यारवाली आँख में वे ही बसे ॥

पत्तियों तक को भला कैसे न तब।
कर बहुत ही प्यार चाहत चूमती ॥
साँवली सूरत तुम्हारी ​साँवले।
जब हमारी आँख में है घूमती॥

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सहकार्य

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  1. हिंदी रस गंगाधर.djvu ‎[४२८ पृष्ठ]
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रचनाकार
रचनाकार

जॉन स्टुअर्ट मिल
जे॰ एस॰ मिल

जॉन स्टुअर्ट मिल (२० मई १८०६–८ मई १८७३) प्रसिद्ध सामाजिक, राजनैतिक तथा दार्शनिक चिन्तक थे। विकिस्रोत पर उपलब्ध उनकी रचनाएँ :

  1. स्त्रियों की पराधीनता - १९१७, THE SUBJECTION OF WOMEN का हिंदी अनुवाद।
  2. उपयोगितावाद - १९२४, Utilitarianism का हिन्दी अनुवाद
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
रबीन्द्रनाथ ठाकुर

रबीन्द्रनाथ ठाकुर या रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) नोबल पुरस्कार विजेता बाँग्ला कवि, उपन्यासकार, निबंधकार, दार्शनिक और संगीतकार हैं। विकिस्रोत पर उपलब्ध इनकी रचनाएँ :

  1. स्वदेश – १९१४, निबंध संग्रह
  2. राजा और प्रजा – १९१९, निबंध संग्रह
  3. विचित्र-प्रबन्ध – १९२४, निबंध संग्रह
  4. दो बहनें' (१९५२), हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा अनूदित उपन्यास।


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आज का पाठ

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सत्यहरिश्चंद्र ब्रजरत्नदास द्वारा संपादित भारतेंदु-नाटकावली का एक अंश है जिसमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र की रचनाओं का संकलन किया गया है। इसका प्रकाशन सं॰ १९९२ में रामनारायण लाल इलाहाबाद द्वारा किया गया था।

प्रस्तुत पाठ में सत्यहरिश्चंद्र का संक्षेपण किया गया है।


"सत्यहरिश्चन्द्र नाटक चार अंक में समाप्त हो गया है। नाटकों में कम से कम पाँच अंक होने चाहिए। इस नाटक का प्रधान रस वीर है। इसके सत्यवीर, दानवीर, कर्मवीर तथा युद्धवीर चार भेद होते हैं, जिनमें दो का राजा हरिश्चन्द्र में और तीसरे का विश्वामित्र जी में परिपाक हुआ है। इसके सिवा इसमें करुण, वीभत्स, हास्य तथा अद्भुत रस का भी समावेश है, जिनमें प्रथम को मात्रा बहुत बढ़ गई है। इसके प्रधान नायक राजा हरिश्चन्द्र धीरोदात्त प्रतापी राजर्षि हैं। विश्वामित्र का राजा हरिश्चन्द्र को सत्यभ्रष्ट करने की प्रतिज्ञा करना बीज है।..."(पूरा पढ़ें)

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