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श्रीरङ्गपत्तन महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित प्राचीन चिह्न का एक अध्याय है जिसका प्रकाशन १९२९ ई॰ में इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग द्वारा किया गया था।


"१४५४ ईसवी मे हेबर तिमाना नामक सूबेदार ने विजयनगर के राजा से श्रीरङ्गपत्तन को ले लिया और वहाँ एक किला बनवाया । उसने, पास ही कलशवाड़ी स्थान के १०१ जैन-मन्दिरों को तोड़कर उनके ईंट-पत्थर से श्रीरङ्ग के मन्दिर को और भी बढ़ाया। हेबर तिमाना के अनन्तर और कई सूबेदार श्रीरङ्गपत्तन में हुए । अन्तिम सूबेदार का नाम त्रिमल्लराज था। १६१० ईसवी मे उसने श्रीरङ्गपत्तन का अधिकार माइसोर के बड़यार राजा को दे दिया। तब से यह स्थान माइसोर की राजधानी हुआ। माइसोर के नरेशों का प्रभुत्व जब क्षीण हुआ तब हैदर अली और टीपू ने इसे अपनी राजधानी बनाया। ४ मई १७६६ ईसवी को अँगरेज़ों ने इस स्थान को अपने अधिकार मे कर लिया।..."(पूरा पढ़ें)