भ्रमरगीत-सार/१२२-ऊधो! जाहु तुम्हैं हम जाने
ऊधो! जाहु तुम्हैं हम जाने।
स्याम तुम्हैं ह्याँ नाहिं पठाए तुम हौ बीच भुलाने॥
ब्रजवासिन सौँ जोग कहत हौ, बातहु कहन न जाने।
बड़ लागै न विवेक तुम्हारो ऐसे नए अयाने॥
हमसोँ कही लई सो सहिकै जिय गुनि लेहु अपाने॥
कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर सँमुख करौ, पहिचाने॥
सांच कहौ तुमको अपनी सौं[१] बूझति बात निदाने।
सूर स्याम जब तुम्हैं पठाए तब नेकहु मुसुकाने?॥१२२॥
- ↑ सौं=कसम, सौगंध।