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अमावस्या की रात्रि प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी है, जो बनारस के सरस्वती प्रेस द्वारा १९४८ ई. में प्रकाशित कहानी-संग्रह "नव-निधि" में संग्रहित है।


"दिवाली की सन्ध्या थी। श्रीनगर के घूरों और खडहरों के भी भाग्य चमक उठे थे। कस्बे के लड़के और लड़कियाँ श्वेत थालियों में दीपक लिये मन्दिर की ओर जा रही थीं। दीपों से अधिक उनके मुखारविन्द प्रकाशवान् थे। प्रत्येक गृह रोशनी से जगमगा रहा था। केवल पण्डित देवदत्त का सतघरा भवन काली घटा के अन्धकार में गंभीर और भयंकर रूप में खड़ा था। गंभीर इसलिए कि उसे अपनी उन्नति के दिन भूले न थे। भयंकर इसलिए कि यह जगमगाहट मानो उसे चिढ़ा रही थी। एक समय वह था जब कि ईर्ष्या भी उसे देख-देखकर हाथ मलती थी और एक समय यह है जब कि घृणा भी उस पर कटाक्ष करती है। ..."(पूरा पढ़ें)