पृष्ठ:Vivekananda - Jnana Yoga, Hindi.djvu/२११

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२०७
बहुत्व में एकत्व


यहाॅ भी है। जो यहाॅ नाना रूप देखते है वे बारबार मृत्यु को प्राप्त होते है।' सहिता भाग मे हम देखते है कि आर्यो में स्वर्ग जाने की विशेष रूप से इच्छा रहती थी। जब वे जगत्प्रपञ्च से विरक्त हो उठे तो स्वभावत ही उनके मन में एक ऐसे स्थान मे जाने की इच्छा हुई जहाॅ दुख से बिलकुल रहित केवल सुख ही सुख हो। 'ऐसे स्थानो का ही नाम स्वर्ग है--जहाॅ केवल आनन्द ही होगा, जहाॅ शरीर अजर अमर हो जायगा, मन भी वैसा ही हो जायगा और वे वहाँ पितृगणो के साथ सदा वास करेगे। किन्तु दार्शनिक विचारो की उत्पत्ति होने के बाद इस प्रकार के स्वर्ग की धारणा असगत और असम्भव मालूम पड़ेन लगी। 'अनन्त किसी एक देश मे है,' यह वाक्य ही स्वविरोधी है। किसी भी स्थानविशेष की उत्पत्ति और नाश दोनो ही काल में होते हैं। अतः उन्हे स्वर्गविषयक धारणा का त्याग कर देना पडा। वे धीरे धीरे समझ गये कि ये सब स्वर्ग मे रहने वाले देवता लोग एक समय इसी जगत् के मनुष्य थे, बाद मे किसी सत्कर्म के फलस्वरूप वे देवता बन गये है: अतः यह देवत्व केवल विभिन्न पढो का नाम मात्र है। वेद का कोई भी देवता किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है।

इन्द्र या वरुण किसी व्यक्ति के नाम नहीं है। ये सब विभिन्न पदो के नाम है। उनके मत के अनुसार जो पहले इन्द्र थे वे अब इन्द्र नहीं है, उनका इन्द्रत्व अब नहीं है, एक अन्य व्यक्ति यहाॅ से जाकर उस पद पर आरूढ़ हो गया है। सभी देवताओ के सम्बन्ध में इसी प्रकार समझना चाहिये। जो सब मनुष्य कर्म के बल से देवत्व प्राप्ति के योग्य अवस्य को प्राप्त कर चुके है