पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/३८

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॥२२॥ पठाई। दुति अाइ तबे प्रावत हि मे दुति पुछी इन कन्या कोन है। तहां दुती मेरे पुछे ते मो सु इल कहि। यह कन्या कंदपकलि नाम विद्याधर स्मस्त विद्याधरन को राजा ता की पुत्री स्तनमंजरी नाम है। यह प्रतांत कहि सुनि तब आपस में अन्यो अन्य प्रीति सनेल ते व्याल कीयो वा सों क्रीडा करत हुँ स्यो। तहां एक समये एकांत विषे बात करत है उहि खमंजरी मो सोंय जु स्वामी अनी ईच्या ते यह समस्त भोग करलु पर यह चित्र में जु लिषी हे स्वर्बलेषा नाम विद्याधरी सु या कों कबठु मंति छुवठु । सु एक दिनि तालु तें रति न सक्यौ कौतुक तें वां को स्तन मे छुयो। तब ऊनि चित्र लु भीतर तें ऐसें लात करि माखो जैसे हुँ सोरठ देस में प्राय पस्यो। तब ते तुं वा के बिल के टुष करि संन्यासी भयो सु फिरत फिरत या नगर में श्रायो अरु ईलां काल्हि की रात्रि अहीर के घर सोवत मे यह देषी जु पहिले ही सांझ अहीर मित्र सों मिलि मद पीवत आपनी स्त्री कुटनी. सों बात करत देषी। तब वाही अहीरी को नीकें करि मारि थांभ सौं बांधि प्राय सोई यो। तब अाधी राति नाईनि वह कुटनी बाई बाई कर उस अहीरी सों यह बात कही। अहो सषी तेरे बिरल करि वह पुरुष मुवो चालत है । जातें चंद्रमा के ऊदय ते अंधकार बदीत भये ते कामदेवं जोबनवंतं पुरुषन्ह को ताकि ताकि तील मारुत हे तातें इहां थांभ सों मोहि बांधिकरि तुं वा को भलो मनाई आव। तब वहि कुटनी बांधी बांधि अलीरी ऊलां गई। पछि छिनक एक रति अहीर जाग्यो। जागिकरि यह बात कही। क्यों अबें जार पासि काले नाइ हि जात । जब यह बात कहे ते वह न बोली तब उनि यह कही।