पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१५०

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॥ १३४॥ बेसम्पायन उवाच। गगन गिरा ते सुद्ध बिचारि। नृप लिए पुत्र अङ्क मंद धारि॥ जन्मकर्म ता को सब भूप। कियो मोद भरिक अनुरूप ॥ भूप कियो सुत मूी घ्रान। बन्दिन पळे सुजश सुखदान ॥ पुत्र स्पर्श मोर नृप पाय । शकुन्तला अादर सुख छाय॥ कियो भूप कहि मीठे बेन । भो परोक्ष तव संगम चेन ॥ यातें तव सुध्या बिचारि। लोक भीति लिय मे निरधारि॥ कले जे अनुचित वचन अकाम। तीन क्षमा कीजे गुण धाम ॥ महिषी प्रिया जानिके भूप। भूषन बसन दिए अनुरूप ॥ भूप भरत सुत को जुबराज। तब कीन्हो सह सचिव समाज ॥ भरत राज्य शासन को कस्त। सकल प्रजा अानद सो भस्त ॥ जीति करे सिगरे वस भूप। चारो धर्म नीति अनुरूप ॥ मण्डलेश भो भूप महान। किए यज्ञ बलु सम मघवान ॥ करवायो मस्त्र कन्व मुनीश। बिपुल दक्षिणा दियो क्षितीश ॥ भरत बंश मे भर नरेश। देव सदृश जे बिपुल बिसेश ॥ ब्रह्म सदृश भे बलु तप धाम। तिन के करें कहालों नाम ॥ तिन मे भए मुख्य जे भूप। तिन को कहत नाम गुण रूप ॥ कारक बंश भए अभिराम। तिन को बर्णन करत ललाम॥ स्वस्ति रघुनाथकवीश्वरामजेन गोकुलनाथेन कविना कृतमहाभारत- दर्पणे प्रादिपर्वणि शकुन्तलोपाख्यानं समाप्तमेकत्रिंशोऽध्यायः॥