पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१४१

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॥१२५॥


सिंह व्याघ्र वराह महिषा गजन कों गहि लेत।
बांधि आश्रम बृक्ष सों सो तिन्हे बल बश देत॥
करत तिन कों दमन चहिके तीन बालक बीर।
धरो ता को नाम मुनि गण सर्वदमन गंभीर॥
देखिके पुरुषार्थ ता को महा ओजस तोन।
जानिके बर कुंवर को जुबराज समय सु जोंन॥
कह्यौ शिष्यन बोलिकै इमि कन्व मुनि बर धीर।
सु शकुन्तला कों जात्रु लै पति धाम सह सुत वीर॥
बत्रुत रहिवो बन्धुजन मे योग्य नारिन कोन।
सुनत सहित शकुन्तला तिन कियो तित कों मोंन॥
गए हास्तिन नगर कों दुधन्त नृप के द्वार।
द्वारपालन कहो नृप सों तास आगम बार॥
बोलि भूपति पूजि तिन कों सुनो आगम सुत्र।
बिदा व्हे ते गए शेउ शकुन्तलै सह पुत्र॥

शकुन्तलोवाच।


पुत्र भूपति रावरो युवराज कीजै याहि।
भयो तुम तें मोहि मे सुर सदृश लीजै चाहि॥
दियो हो बर जोंन भूपति औसि कीजै तौंन।
यदा संगम भयो मो सो कियो हो पन जौंन॥
समुझि ए जे कन्व ऋषि के कहे आश्रम माह।
बैन सो प्रतिपालिए अब सुनत्रु हो नरनाह॥
सुनो भूपति समुझि मन मे क्षणक रहिके मोन।