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(आठवां
हृदयहारिणी।


इसी लिये तो अभी आप, आप ही आप न जाने क्या क्या अनाप शनाप बक रही थीं। आप यह न जाने कि,-'मुझे किसी बात की कुछ खबर ही नहीं है। मैंने वे सारी बातें अभी अपने कानों से सुनी हैं, जो आप; आप ही आप कह रही थीं; इसलिये मैं यह जानना चाहता हूं कि वह कौनसा बढ़भागी पुरुष है, जिसने बरजोरी आपके मन को छीन कर आपके सुकुमार हृदय पर इतनी गहरी चोट पहुंचाई है? यदि आप मुझे अपना कुछ भी हितू समझती हों तो लाज संकोच छोड कर उस भाग्यवान का पता जल्द बतलाइए तो मैं अभी उसे, चाहे वह जहां पर हो, ढूंढ निकालूं और आपको उसके हाथ सौप कर सदा के लिये सुचित्त हो जाऊं और जगदीश्वर को कोटि कोटि प्रणाम इसलिये करूं कि उस दयामय पर- मात्मा ने सचमुच मुझ अधम के हाथ से एक अनाथिनी बालिका का उद्धार कराया।"

कहते कहते बीरेन्द्र की आंखें भर आईं, पर उधर कुसुम का तो बहुत ही बुरा हाल था; अर्थात बीरेन्द्र के मुख से निकलते हुए एक एक शब्द उस विचारी (कुसुम) के हदय के साथ वह काम कर रहे थे, जो नमक जख्म के साथ करता है। बीरेन्द्र की बातों से कुसुम ने समझ लिया कि,-' इन्होंने छिप कर मेरी सारी बातें सुनली;' इस लिये वह बहुत ही लज्जित हुई, पर जब बीरेन्द्र उसके कलेजे में छुरी चुभोने लगे तो वह उन मर्मभेदी शब्दों से इतनी घायल हुई कि उसके कलेजे का खून पानी होकर उसकी आंखों से बहने लगा। उसकी यह दशा देख बीरेन्द्र से न रहा गया और चट उन्होंने उसका आंसू पोंछ दिया और यों कहा,-

"कुसुम! आज तुम्हें क्या हो गया है, जो आप भी इतनी दुखी होती हो और दूसरे को भी कष्ट पहुंचाती हो।"

आखिर, बिचारी से न रहा गया और उसने बीरेन्द्र की ओर तिरछौहें देख कर कहा,-"तुम्हें इस समय यहां किसने बुलाया है?”

बीरेन्द्र ने मुस्कुराकर कहा,-" यह बात तो तुम्हें अपने मन से ही पूछनी चाहिए। मैं तो केवल इतना ही जानताया कह सकता हूं कि जहां पर कुसुम खिल रहा हो, वहां पर रस का लोभी भौंरा न पहुंचे, यह कभी हो ही नहीं सकता।"