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पाँचवाँ अध्याय


पत्रों में उसे अपने हाथ से दो चार अनुरोध-सूचक शब्द लिख देना चाहिये जिससे पत्र-पाने-वाले पर नैतिक प्रभाव पड़े।

(३) भेंट-मुलाकात में

लोग भेंट या मुलाकात के लिए उन्हीं के पास जाते हैं, जिनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध स्नेह अथवा काम-काज होता है। कभी-कभी परिचित व्यक्ति के द्वारा अपरिचित, परन्तु प्रतिष्ठित लोगो से भी भेंट की जाती है। गोसाई जी ने कहा है, इहि मन हठि करि-हौ पहचानी। साधु तें होइ न कारज हानी॥

जिसके घर भेंट करने को जाते हैं उसके सुभीते पर भेंट करने-वाले को अवश्य ध्यान रखना चाहिये। किसी के यहाँ ऐसे समय पर न जाना चाहिये जब उसे किसी से मिलने का अवकाश वा सुभीता न हो। घनिष्ठ मित्र एक दूसरे से बिना किसी संकोच के दिन में कई बार मिलते हैं, पर इस अवस्था में भी शिष्टाचार पालने की आवश्यकता है। किसी के यहाँ बिना किसी आवश्यक कार्य के दिन निकलते ही अथवा भोजन के समय या ठीक दोपहरी में जाना अनुचित है। अधिक रात को भी साधारण अवस्था में किसी के यहाँ न जाना चाहिये। काम-काजी लोगो को समय का बहुत संकोच रहता है, इसलिये किसी के यहाँ प्राय आधे घंटे से अधिक बैठना उचित नहीं है। यदि इस अवधि में महत्व पूर्ण बातचीत पूर्ण हो सके तो बहुत अच्छी बात है। जिस समय किसी मनुष्य की बात-चीत में उदासीनता, शिथिलता अथवा उकताहट दिख पड़े उस समय समझ लेना चाहिये कि उसे मिलने का अधिक सुभीता नहीं है। इसलिये ऐसे संकेत को सूचना समझकर उसके यहाँ से चले आने का उपक्रम करना चाहिये। यदि वह जाने वाले व्यक्ति के प्रस्ताव को सुनकर कुछ अधिक बैठने का अनुरोध करे तो यह अनुरोध मान लिया जावे ओर कुछ समय के पश्चात् उससे विदा ग्रहण की