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हिन्दुस्थानी शिष्टाचार


जब विदेशी भाषा पंडिताई बखारने अथवा मातृ-भाषा की अवहेलना के निमित्त पढ़ी जाती है तब उसका प्रभाव हानिकारक होता है। विदेशी भाषा का प्रभाव अथवा अनुराग लोगो में स्वभाव ही से इतना प्रबल होता है कि जो लोग उस भाषा के दो-चार ही शब्द सीख लेते हैं वे उनका जहाँ तहाँ उपयोग किया करते हैं ।

विदेशी-भाषा जानने वाला मनुष्य बहुधा भावुकता के कारण श्रोताओं की दृष्टि में असाधारण विद्वान समझा जाता है । इस कारण लोग उस भाषा का टूटा फूटा ज्ञान प्राप्त करके भी प्रशंसा के पात्र बनने की इच्छा करते हैं। हमी लोगो में जो मनुष्य सस्कृंत,पाली अथवा प्राकृत का ज्ञान रखता है वह केवल हिन्दी जानने वाला की अपेक्षा अधिक प्रतिष्ठा का पात्र समझा जाता है, चाहे उसे अपनी मातृ-भाषा का अधूरा ही ज्ञान हो । इसी प्रकार फारसी अथवा अरबी जानने वाले लोग भी असाधारण आदर के योग्य माने जाते हैं। जो लोग केवल इसी प्रशंसा-प्राप्ति के उद्देश्य से विदेशी भाषाएँ सीखते हैं उनके सम्बन्ध से भी समझना चाहिये कि उन पर विदेशी भाषा का हानिकारक प्रभाव पड़ा है। आज- कल अँगरेजी के ज्ञान का यह मान नहीं है जो तीस वर्ष पूर्व था; तथापि अब भी लोग अंगरेजी के ज्ञान को केवल जीविका का ही नहीं किन्तु प्रतिष्ठा का भी साधन मानते हैं।

विदेशी भाषा का ज्ञान अनावश्यक नहीं है । आज-कल लोगो को पृथ्वी के कई भागों में व्यापार के लिए आना जाना पड़ता है। ऐसी अवस्था में किसी एक या अनेक विदेशी भाषाओं के ज्ञान के बिना काम नहीं चल सकता । अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी उन्नत विदेशी भाषाओं को सीखना आवश्यक है। इसके सिवा राजकाज का अनुभव प्राप्त करने के लिए भी विदेशी भाषाओ का ज्ञान आवश्यक है, अतएव कोई भी आवश्यक