पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३१०

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कागंज ३११ लोग वैसा मुन्दर 'पपिरि' नहीं बना सकते थे। स्थिर किया है कि, करीव ईखो सन् ८५में चीनके रोमकगण भी इसी दिए 'इरिटिका पेपिरि' नहीं लोगोंने ही अंशमान पदार्थ से सबसे पहिले कागक पाते थे; परन्तु पोरसे इमलीगॉन वैसा बना लिया बनाया था। था। रोमकसम्राट् अगस्तासके समयमें रोमकगण कन्फचिके समय चीनवासी बांसके भीतरी छालके मिसर देशसे याजकोंके लिखे हुए हेरिटिका' खरीद अपर तीहा लेखनी द्वारा लिखा करते थे। फिर इन लाते थे और एक प्रकार की औषधिसे उसके अक्षर लोगोंने बांसकी ही छाल, रई, रेशम और अन्यान्य मिटा कर अपने व्यवहारमें लाया करते थे, यह औषाध बचोकी छालसे 'मंड बनाके कागज बनाना सोखा था। भी रोमवासियों ने बनाई थी। इस कागजका नाम, हैनवंशीय होटि नामक चीनसबाटके. राजत्वकालमें रोमवासियोंने अपने सम्राटके नामानुसार;"अगस्तास" कई एक वृक्षोंकी छाल, मछली पकड़नेके पुराने जालके “कागज रक्खा। उससे नोचे दर्जेके 'पेपिरि का नाम, टुकड़े, मन, और रेशम एकसाथ सवाल कर 'मंड' वहांको रानोके नामानुसार, 'लेभियाना पड़ा। बनाते थे और इसो मंडसे ही कांगंज-बनता था। पीछेसे जब इन लोगोंको 'पपिरि बनाना आ गया कागज बनानके लिए पहिले जो कुछ यंत्र पादि बनाये तब उक्त दा श्रेणिके सिवा 'एम्फिथियेटिका' 'फेनि गये थे, अब उसोको उन्नति करके उन्ही यंत्रोसे याना' 'एम्योरटिका' कभिया' आदि नामकै भिन्न उत्तमोत्तम कागज बनाये जाते हैं। अब चीनदेशमें 'भिन्न दामौके पपिरि बनाने लगे थे। प्रिनिके नानाप्रकारकै कागज बनते हैं। इस देश में हो-सि इतिहास पढ़नेसे समझ सकते हैं कि, ग्रीस या रोमके नामक धास या फंस इतना अधिक उत्पन्न होता है सर्वसाधारणका विश्वास था कि, पेपिरि बनाने के लिए, कि, ये लोग उससे शवका दाह करते है। मिसर देशीय नौल नदके पानी को प्रत्यन्त ही प्राण्य जो कुक भी हो, इंगलैंडीय ऐतिहासिक कागज कता है, क्योंकि नोलनदके पानी में स्वभावतः एक की उत्पत्तिमें चीनको ही प्रथम उपाधि देंया और प्रकारका गोदसा मिला हुआ है, उससे पेपिर जोड़ने में किसीको; परन्तु ग्रोक इतिहाससे यथार्थ बात मानी अधिक सहायता मिलती है। पेपिरिको छाल एक जा सकती है। पञ्चाबविजयी ग्रोकसम्राट् अलेक- "टेविल पर समान भावसे सजा कर उस पर नीननदके जन्दरके सेनापति नियरखुम् लिख गये है, कि, उस पानीके छोटे दे कर, कुछ देर तक धाममें सुखा समय उनने भारतवर्षमें उत्तम, नरम, चिशने और लेनेसे ही पपिरि बनता था; परन्तु यह ठीक नहीं मजबूत एक तरहके 'रुइके' बस्तुके ऊपर था। पेपिरिकी छालको भिगोनेसे ही, उसमें एक सजगारले लेन देनका हिसाब लिखनेका बहुत प्रचार प्रकारका गोंदवा निकलता था और उसे घाममें सुखा देखा है। यह शायद तुलात वा तुलाट अथवा लेने ही वह सूख कर जुड़ जाता था। तुलट वागजकी भांतिका होगा। माकिदन- इसके बाद कैमे, किस गतिले अंशुमान् पदार्थ को राजने · खुष्ट-जन्मसे . ३२१ वर्ष पहिले भारतपर "मंड' बनाके कागज बनानेकी तरकोव निकाली गई, पाहमण किया था, इसलिए उसके बहुत पहिलेसे “यह जाननेका उपाय नहीं है। हां, खोजीगणोंका भारतमें तुलाटके भांतिका कागजका प्रचार था, यह अनुमान है कि, जैसे बरैया, भौंरा और मौद्वारके छत्ते निश्चित बात है। बहुतांको धारणा है कि बिलायती देखने में बहुत कुछ कागजसे हैं और वह वृक्ष प्रादिसे कागज वा पाधुनिक मिलोंके कागज पर हड़ताल ही उत्पन्न होते हैं। एक बरैया प्रादि जिस प्रकार कर देने ही तुलट कागज बन जाता है ; पर वास्तव चाय विशेषको तरल बनाकर थोड़ा थोड़ा मुहमें में ऐसा नहीं है। पहिले मालदह जिले में यह तुलट लेकर बड़े बड़े छत्ते बना लेते हैं, इसी प्रकार ही शायद कागज बहुत ही ज्यादा बनता था। देश विदेशों में भी कागज बनाया जाता था। अंग्रेज ऐतिहासिकोंने इसका बहुत कुछ भादर होता था। इसीलिए माल-