पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४६६

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बुलन्दशहर-बुलबुल शासनकर्ता राजकाय चलाते थे । वरण नगर उस मुसलमान और वाहिक राजाओंके समय उनके देशोंके समय कोइलके अधीन था । १८०३ ई०में अंगरेजो लोग यहां आ कर बस गये थे, इसमें जरा भी संन्देह सेनाने कोइल और अलीगढ़ दुर्ग पर दखल जमाया। नहीं। दोरवंशीय राजा हरदत्तने इसलाम धर्म में दीक्षित १८२३ ई०में अलीगढ़ और मोरटका कुछ अंश ले कर हो कर तथा तरह तरहका उपढौकन भेज कर गजनीपति बुलन्दशहर एक स्वतन्त्र जिलारूपमें गिना जाने लगा। महमूदको संतुष्ट किया था। यहांके शेष हिन्दुराजा चन्द्र- उसके बादसे ले कर १८५७ ई०के गदर तक यहां और सेनने महम्मदघोरीके युद्ध में अपने जीवनको न्योछावर कोई उल्लेखयोग्य घटना न घटी। कर दिया था । युद्ध में मुसलमान सेनापति खाजा लाल. सिपाहीविद्रोहके ममय गुजरों, हम पदातिक मेना. . वरणी भी खेल रहे थे। आज भी उनकी कब्रके आस दल, मालगढ़के शासनकत्ता वालिदाद खाँ और इस्लाम . पासका स्थान उन्हींके नामसे पुकारा जाता है। धर्मावलम्वी राजपूतोंने अंगरेजोंसे घमसान युद्ध किया। प्राचीन हिन्दु प्रधानताके निदर्शन स्वरूप यहां और था। सिपाहीविद्रोह दग्यो । कोई अट्टालिका या देवमन्दिरका ध्वंसावशेष नजर नहीं इस जिलेमें २३ शहर और १५०६ ग्राम लगते हैं। . आता । पर हां, निकटवती स्थानकी मट्टी खोदनेसे जनसंख्या १० लाखसे ऊपर है। सैकड़े पीछे ७६ जहां तहां खोदित स्तम्भ वा अट्टालिकादिका खण्डित हिन्दू, १६ मुसलमान और शेषमें आर्य तथा ईसाई लोग अंश देखा जाता है। उसका गठनकार्य देखनसे वह हैं। यहांकी प्रधान उपज गेहूं, चना, मकई, ज्यार और प्राचीन हिन्दृगठन सा प्रतीत होता है, इसमें कोई उन बाजरा है। विद्याशिक्षामें यह जिला बहुत पोछा पड़ा। नहीं। प्राचीन भग्न अट्टालिकाके मध्य सम्राट अकवर हुआ है। सैकड़े पीछे ३ मनुष्य शिक्षित मिलते हैं। शाहके प्रधान सेनापति बहलोल खाँका समाधिमन्दिर ही अभी कुल मिला कर २०० स्कूल हैं। स्कूलके सिवाय सर्वप्राचीन है । अलावा इसके प्राचीन नगरके बीच में यहां है अस्पताल और चिकित्सालय हैं। जुम्मा मसजिद् दृष्टिगोचर होती है। अंगरेजोके दखलमें .२ उक्त जिलेकी एक तहसील। यह अक्षा० २८ आनेसे इसकी कोई विशेष श्रीवद्धि नहीं हुई है। शहर- १४ से २८ ४३ उ० तथा देशा० ७७ ४३ से ७८१३ में एक हाई स्कूल, एक तहसीली स्कूल और चार प्राइ- पू०के मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण १७७ वर्गमील मरी स्कूल हैं। और जनसंख्या साढ़े तीन लाखके करीब है। इसमें बुलबुल ( अ० फा० स्त्री० ) एक प्रसिद्ध गानेवाली छोटी बुलन्दशहर, शिकारपुर, सियाना और औरङ्गावाद नामक चिड़िया। इसे अंगरेजीमें नाइटइङ्गल ( .Nightingalc ३ शहर तथा ३७६ ग्राम लगते हैं। जिले भरमें यह सव- . वा IPcilorretim aucce.s ) और पारसी भाषामें से अच्छी तहसील है। काली नदी तहसीलके उत्तरसे "बुलबुलवोस्ता" अथवा "बुलबुल हजार दस्तान" दक्षिणको बह गई है। कहते हैं। उर्दू वाले इस शब्दको पुल्लिग मानते हैं। ____३ उक्त तहसीलका एक सदर। यह अक्षा० २८१५ जान पड़ता है, कि बहुतोंने इस प्रसिद्ध गानेवाले पक्षीको उ० तथा देशा० ७७५२ पू०के मध्य अवस्थित है । जन- देखा है। इसकी सुदरता साधारण है। किंतु इसका संख्या १८:५९के लगभग है । यहां इष्ट इण्डिया रेलवेका स्वर बहुत सुललित है। जिस किसी व्यक्तिने एक बार एक स्टेशन है। यह नगर समुद्रपृष्टमे ७४१ फुट ऊंचा भी ध्यान लगा कर इसके गानको सुना है उसने मुक्त है। इसका प्राचीन अंग एक गएटशैलके शिखर पर और कंठसे इसको गानेवाले पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ माना है नूतन नगर निकटवत्ती समतल क्षेत्र पर बसा हुआ है। और इसको चित्तोन्मादक स्वरकी भूरि भूरि प्रशंसा की प्रसिद्ध माकिदनवीर महात्मा अलेकसन्दर तथा है। यह पक्षी १०० रूपयेसे १५० रुपये तक बिकता उत्तर भारतके हिन्दूवाहिक राजाओंकी नामाङ्कित मुद्रा है। भाज भी वरण नगरके नाना स्थानों में पाई जाती है। प्राणी तत्त्वविदोंका कहना है, कि बुलबुलका गानोप-