पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२१

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केवल हरिको ही भाश्रय किये हुए हैं, वे ही ( शौनकादि हरिके प्रति मन समर्पण और उनके गुणादिका भनु- ऋषि) शानी दास हैं। जो पहलेसे ही भजन-विषयमें संधान किया जाता है। फिर इस अयोगके भी दो भेद आसक्त हैं उन्हें सेवानिष्ट कहते हैं---चन्द्रध्वज, हरिहर, हैं, उत्कण्ठता और वियोगता । अदष्टपूर्व हरिकी दर्श- बहुलाव, इक्ष्वाकु, श्रुतदेव और पुण्डरीकादि ये ही नेच्छाको उत्कण्ठित कहते हैं। इसमें समस्त व्यभिचारी. सेवानिष्ठदास हैं। सम्भावना होने पर भी औत्सुका, दैन्य, निर्वेद, चिन्ता, उद्धव, दारुक, सात्यकि, श्रुतदेव, शत्रुजित्, नन्द, उप चपलता, जड़ता, उन्माद और मोह इन सब व्यभिचारी- नन्द और भट आदि पारिपद हैं। इनके मन्त्रकार्य और भावकी अधिकता होती है। औत्सुकाका उदाहरण सारथ्य कार्यमें नियुक्त रहने पर भी कभी कभी अव कर्णामृतमें इस प्रकार है-- सर पा कर ये परिचर्यादि कार्य में नियुक्त होते हैं। "अमून्यधन्यानि दिनान्तगणि हरे त्वदालोकनमंतरेण । कौरवोंके मध्य भीष्म, परीक्षित और विदुरादिकी भी अनाथवंधो करुणेकसिंधो हा हंत हा हंन कथं नयामि ॥" उन पार्षदोंमें गिनती होती है। पारिपदोंमें उद्धव ही बिल्वम इलने कहा है,- हाय ! हाय ! हे हरेः! हे श्रेष्ठ हैं। अनाथबंधो! हे करुणासिंधी! बिना आपके दशनके ___ अनुगदास · पुरस्थ और व्रजस्थके भेदसे अनुग दो किस प्रकार यह अधन्य दिन यापन करूंगा। प्रकारका है -सुरचन्द, मण्डन, स्तम्ब और सुस्तम्बादि- हरिके साथ सङ्गलाभ करके फिरसे उसके विच्छेद को पुरस्थ अनुग दास और रक्तक, पत्रक, पत्री, मधुव्रत, : होनेको वियोग कहते हैं। इस वियोगके अङ्गमें ताप, रसाल, सुविलास, प्रेमकन्द, मरन्दक, आनन्द, चन्द्रहास, कृशता, जागर्या, आलस्यशून्यता, अधैर्य, जड़ता, व्याधि, पयोद, वकुल, रसद और शारदको व्रजस्थ अनुगदास उन्माद, मूर्छा और मृति ये दश दशाए होती हैं । इनमें- कहते हैं। से केवल एकका उदाहरण नीने दिया जाता है --- ___इस रसमें श्रीकृष्णको मुरलीध्वनि, शृङ्गरव, हाम्य- .. ___ "दनुजदमनयाते जीवने त्वय्यकस्मात् युक्तावलोकन, गुणोत्कर्षश्रवण, पद्म, पदचिह, नूतन मेघ प्रचुरविरहत्वापैर्ध्वस्तहृत्पङ्कजायां । और अङ्गसौरभ उद्दीपन है। व्रजमभिपरितस्ते दासुकासारपङ्क्ती सर्वतोभावमें भगवदाज्ञाका प्रतिपालन, भगवत् । न किल वर्मातमार्ताः कर्तुमिच्छन्ति हसाः॥" परिचय में ईर्षाशून्यता, कृष्णदासके साथ मित्रता और हे कृष्ण ! जीवनस्वरूप तुम जो वृन्दावनसे चले प्रोतमात्र निष्ठता दास्य प्रेमरसका अनुभाव है। गये हो उससे व्रजभूमिके चतुर्दिकस्थ तुम्हारे दासरूप स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु, वैवणे, अश्रु और सगेवर श्रेणीके अकस्मात् प्रवल विरहानल द्वारा हत्- प्रलय ये आठ सात्त्विकभाव हो इसमें सात्त्विक हैं। पद्म मूख गये हैं। प्राणरूपी हंस आर्त हो कर अब ___ हर्ष, गव, धृति, निर्वेद, विषण्णता, दैन्य, चिन्ता, · उसमें रहनेकी इच्छा नहीं करते। स्मृति, शङ्का, मति, औत्सुक्य, चपलता, वितर्क, आवेग, कृष्णके साथ मिलनको योग कहते हैं। वह योग लजा, जड़ता, मोह, उन्माद, अहिथ्या, बोध, स्वप्न, सिद्धि, तुष्टि और स्थितिके भेदसे तीन प्रकारका है। ध्याधि और मृति पे सब व्यभिचारी भाव हैं। सम्भ म उत्कण्ठितावस्थामें कृष्णप्राप्तिको सिद्धि, विच्छेदके बाद प्रीतिको इसका स्थायीभाव कहते हैं। इस सम्भ म श्रीकृष्णप्रामिको तुष्टि और श्रीकृष्णके साथ एकत्र वास- प्रीतिके वृद्धिप्राप्त होनेसे पहले प्रेम, पोछे स्नेह, उसके : को स्थिति कहते हैं। बाद राग पर्यन्त हुआ करता है। शान्तप्र ममें स्नेह और गौरव-प्रोतिमें भी यही सब भाव हुआ करते हैं। राग नहीं होनेके कारण शान्तसे दास्यप्रेम श्रेष्ठ है। गौरवप्रीतिका विषयालम्बन कृष्ण हैं, आश्रयालम्बन उनके ___यह दास्यप्रेम पुनः अयोग और योगभेदसे दो प्रकार- लालनीय सारण, गद, प्रद्य म्न आदि कुमारगण हैं। का है। हरिके सङ्गाभावको अयोग कहते हैं। इसमें : सम्भ्रम, प्रीति और गौरवप्रीतिशाली द्वारकाके दासों-