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हिन्दी भाषा की उत्पत्ति।


लग़मानी आदि असंस्कृत आर्य्य-भाषा बोलनेवालों की संख्या इस देश में बहुत ही कम है। १९०१ ईसवी में वह सिर्फ़ ५४, ४२५ थी।

इस तरह आर्य्य-भाषाओं के दो भेद हुए। एक असंस्कृत आर्य्य-भाषायें; दूसरी संस्कृतोत्पन्न आर्य्य-भाषायें। ऊपर एक जगह आर्य्य भाषायें बोलनेवालों की संख्या जो दी गई है उसमें असंस्कृत आर्य-भाषायें बोलनेवालों की संख्या शामिल है। उसे निकाल डालने से संस्कृतोत्पन्न आर्य्य-भाषायें बोलनेवालों की संख्या २१९, ७२६, २२५ रह जाती है।

कुछ दिन हुए लन्दन की रायल एशियाटिक सोसायटी ने एक पुस्तक प्रकाशित की है। उसमें उत्तर-पश्चिमी भारत की पिशाच-भाषाओं का वर्णन है। उसमें लिखा है कि असंस्कृत आर्य्य-भाषायें पुरानी पैशाची प्राकृत से निकली हैं। यहाँ उन्हीं पैशाची प्राकृतों से मतलब है जिनका वर्णन वररुचि ने किया है।