पृष्ठ:हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय.djvu/४५०

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हिन्दी काव्य में निगुण संप्रदाय और केशवदास की 'रसिकप्रिया' तथा स्वयं अपने नामधारो व सम- सामयिक कवि सुंदरराय की 'रसमंजरो' एवं सुन्दर भंगार' जैसी रचनाओं का प्रतिषेध किया ।x" निर्गुणी लोग उन अनर्थकारी बातों में नहीं पड़ते जिन्हें फासेट' के अनुसार, “पश्चिमी देशों के शृंगारोन्मत्त संत एवं धार्मिक ऋद्धालु' जन, भक्तिमान्, आत्मद्रष्टा के रूप में, अपनाया करते हैं।" भारत में भी शृंगारोन्माद की प्रतिध्वनि तंत्रानुयायी शाक्त रहस्यवादियों तथा अन्य कतिपय संप्रदाय के लोगों में सुनी जाती रही है। तांत्रिक शात सम्प्रदायों ने तो औचित्य को सोमा का उल्लंघन कर दिया। उन्होंने केवल स्त्रियों से यह सीखने का उपदेश ही नहीं दिया कि हमें प्रेम, प्रतिष्ठा एवं अपने आप को भी किस प्रकार अर्पित कर देना चाहिए, प्रत्युत साधकों को अनुचित प्रेम करने की भी शिक्षा दे दी। कारण यह कि उनकी स्थूल दृष्टि के अनुसार अपनी पत्नी की ओर से किसी प्रकार के पातिव्रत भंग करने का तो, इस सम्बन्ध में कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता । बंगाल में आज भी सहजिया संप्रदाय इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। सहजिया लोगों का विश्वास है कि उक्त सम्प्रदाय के अनुयायियों का परमात्मा के प्रति जैसा उत्कृष्ट प्रेम होना x-रसिकप्रिया रसमंजरी और सिंगारहि जानि । चतुराई करि बहुत विधि विष बनाई पानि ॥ विष बनाई आनि लगत विषयिन कौं प्यारी । जागै मदन प्रचंड सराहै नख शिख नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्ठान खाइ, रोगहि विस्तारै । सुंदर यह गति होइ, जो रसिक प्रिया धारै ॥ ५ ॥ "सुंदर विलास,' पृ० ५२ ।

-'डिवाइन इमैजिनिंग,