पृष्ठ:हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय.djvu/४४

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( १७ ) किया है उन्हें 'बानी' व 'साखी' कहते हैं जो क्रमशः पदों व दोहों के ही पर्यायवाची शब्द हैं। अपने गूढ़ भावों की अभिव्यक्ति इन्होंने अधिकतर उन प्रतीकों के सहारे की है जो साधारण जीवन के क्षेत्रों से चुने गये हैं। परन्तु इसके लिए इनके काम में सबसे अधिक आनेवाले वे रूपक हैं जो दाम्पत्य-भाव को प्रकट करते हैं और जिनके प्रयोग वे जीवात्मा व परमात्मा के सम्बन्ध में करते हैं। इनके ये प्रयोग उच्चकोटि की प्रेमभावनाओं के द्योतक हैं और इनमें लक्षित होनेवाले विरह के भावों में संतों के सच्चे व शुद्ध हृदय का परिचय मिलता है । संतों की रचनाओं की एक विशेषता उनकी उलटवासियों में भी पायी जाती है जो उनके कथन को आकर्षक बनाकर हमें उन पर विचार करने को विवश कर देती है। ६-पुस्तक के अंतिम अध्याय में लेखक ने इन संतों का कुछ परिचय देने का भी प्रयत्न किया है। सर्वप्रथम उसने उनकी ओर संकेत किया है जो इनके पथ-प्रदर्शक थे और जिनमें से कुछ के नाम इन्होंने बड़ी श्रद्धा के साथ लिये हैं। तदनंतर कबीर, नानक, दादू, प्राणनाथ, बाबालाल, मलूकदास, दीनदरवेश, मारीसाहब, जगजीवन- दास, पलटू, धरनीदास, दरियाइय, बुल्लेशाह, चरणदास, शिवनारायण तुलसी साहब एवं शिवदयाल साहिब के संक्षिप्त परिचय देते हुए उसमें उनकी रचनाओं एवं पंथादि की भी चर्चा की गई है । इन संतों के परिचय स्वभावतः संक्षिप्त हैं और उसकी कई एक कमियों की पूर्ति डा० बड़थ्वाल ने पुस्तक के अंत में दी गई विशेष टिप्पणियों-द्वारा करने की चेष्टा की है। अंत के तीन परिशिष्टों में से पहले में कतिपय गूढार्थवाची शब्दों की एक तालिका दे दी गई है और दूसरे में उस साहित्य की भी एक आलोचनात्मक चर्चा की गई है जिससे लेखक ने अपना निबंध प्रस्तुत करते समय सहायता ली थी। तीसरे में, मूल पुस्तक में आई हुई कुछ बातों और तथ्यों पर विशेष टिप्पणियाँ हैं।