पृष्ठ:हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय.djvu/१५३

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दूसरा अध्याय ७३ वे एक बार शाही दरबार में गये थे, जहाँ उनके सिद्धांतों की सत्यता को सबने एकमत होकर स्वीकार किया। उनके शिष्य रजबदास ने एक साखी में इस घटना का उल्लेख किया है । दादू के कुल मिलाकर १०८ चेने थे जिनमें से सुन्दरदास सबसे प्रसिद्ध हुा । सुन्दरदास नाम के उनके दो शिष्य थे। बड़ा सुन्दरदास, जिसने नागा साधुओं का संगठन किया, बीकानेर के राजघराने का था । प्रसिद्ध सुन्दरदास छोटा था । वह छः ही वर्ष की अवस्था में दादू की शरण में भेज दिया गया था किन्तु उनकी देखभाल में वह एक ही वर्ष रह सका, क्योंकि एक साल बीतते-बीतते दादूदयाल की मृत्यु हो गई । इसलिए सुन्दरदास का गुरुभाई जगजीवनदास उसे काशी ले आया, जहाँ उसने अठारह वर्ष तक व्याकरण, दर्शन और धर्मशास्त्र की शिक्षा पाई। निर्गुण-संतों में वही एक व्यक्ति है जिसे पोथी-पत्रों की शिक्षा मिली थी । उपयुक जगजीवन दास नारनौल के उस सतनामी संप्रदाय का संस्थापक जान पड़ता है जिसके अनुयायियों ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह खड़ा किया और जिन्हें उसकी सेना ने सं० १७२६ (१६७२ई०) में समूल नष्ट कर दिया । दादू का प्रधान शिष्य और उत्तराधिकारी उन्हीं का पुत्र गरीबदास था। उनके दूसरे पुत्र का नाम मिस्कीनदास था। उनके प्राय: सब शिष्य कबि थे । छोटे सुन्दस्दास ने ज्ञानसमुद्र, सुन्दर विलास, ये दो मुख्य ग्रन्थ लिखे । इनकी साखियों और पदों की भी संख्या काफी है। सुन्दरदास के उपयुक्त ग्रन्थों के अतिरिक्त पौड़ी हस्तलेख में गरीबदास, रजबदास, हरदास, जनगोपाल, चित्रदास, बखना, बनवारी, जगजीवन, छीतम और विसनदास की रचनाएँ संगृहीत अकबरि साहि बुलाइया गुरु दादू को आप । साँच झूठ व्योरो हुओ, तब रह्यो नाम परताप ॥ -'सर्वांगी' पौड़ी हस्तलेख, पृ० ३६५ (अ)-३६६ ।