पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 8.djvu/५१

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

मर्मज्ञ मद ३५१० मर्माभाम छवि जो मन को प्राकर्पित करे । उ०—हमारी समझ यह वात । गर्मवाक्य । उ०-श्रीमुप मे श्रीकृष्ण के मुना था जहा प्रस्तुत अर्थ जीवन या जगत् की मर्मछवियो, वहाँ अनुम्यूत भारत ने गीतागीत सिंहनाद मर्मवारणी जीवन मग्राम का, मून्यो का ही पर्याय हो सकता है। प्राचार्य०, पृ० १४५ । सार्थक समन्वय ज्ञान फर्म भक्ति योग का ।-अनामिका, मर्मज्ञ-वि० [ स०] १ जो किसी बात का मर्म या गूढ रहस्य पृ०५८ जानता हो । तत्वज्ञ। २. भेद की बात जाननेवाला । रहस्य मर्मवित्-वि० [सं०] मर्म या तत्य जाननेवाला । मर्मत। जाननेवाला । मर्मविदारण-समा ५० [सं०] मर्मच्छदन । मर्मच्छद । मर्मपीडा--मशा स्पी० [ स० मर्मपीडा ] मन को पहुंचनेवाला क्लेश । मर्मवेदी-वि० [ म० मर्मवेदिन् ] मर्मज्ञ । प्रातरिक दुख। मर्मवेधी-वि० [मं० मर्मवेधिन् ] २० 'मर्मभेदी' । मर्मप्रहार-नज्ञा पुं० [सं०] वह प्राघात जो मर्मस्थान पर हो । मर्मव्यथा-मज्ञा पं० [ म• ] मर्म पीटा । तीव्र वेदना (to} । मर्मस्थान की चोट । मर्मशरीर-सझा पं० [ म० मर्म +श और ] नित्यम्बम्प । मुख्य म्प। विशेप-वैद्यक में इसे वगग का एक भेद माना है। इसमे रोगी गूढ प्रग । अनिवार्य लक्षण । उ०—पर ज्या ज्या शास्त्रीय विचार गिरता पडता, अटपट वकता, घबराता और मूछित होता है । गभीर प्रौर मूक्ष्म होता गया त्यो त्यो माध्य और माधनो को उसके शरार में गरमी छटकती है, गरमी का बहुत अधिक अनुभव विविक्त करके काव्य के नित्यस्वरूप या ममंगरीर का अनग हाता है, और इद्रियाँ ढोली पड़ जाती हैं। निकालने का प्रयाम बढ़ता गया । --म०, पृ०५०। मर्मभिद्-वि० [ म० ] मर्मच्छिद् । मर्मभेदी। उ०—दुष्ट रावण मर्मस्थल-सझा पुं० [सं०] १ मर्मस्थान । विशेष २० 'मम'। कुभकरण पाकारिजित् मर्मभिद् कर्म परिपाकदाता। तुलसी हृदय । मन । मतस्तन । उ०-कविता अपनी मनोरजन शक्ति (शब्द०)। द्वारा पढ़ने या सुननेवाले का चित्त रमाए रहती है, जीवनपट मर्मभेद-मञ्ज्ञा पुं० [ ] १ रहस्योद्घाटन । महत्वपूर्ण वातो का पर उक्त कर्मों की मुदरता या विरूपता अकित करके हृदय प्रकट होना । २. हृदय वा मर्म का वेवन (को॰] । के मर्मस्थलो का स्पर्श करती है। रस०, पृ० २७ । मर्मभेदक-वि० [सं०] १ मर्म छेदनेवाला। २ हृदयविदारक। मर्मस्थान-सभा पुं० [ #० ] मर्मस्थल । मर्म । विशेष दे० 'मर्म' बहुत अधिक हार्दिक कष्ट पहुंचानेवाला । मर्मस्पर्शिता-सया रसी० [० मर्मस्पृश् ] मर्मस्पों होन का भाव । मर्मभेदन-सञ्ज्ञा पुं॰ [ स० ] वाण । तीर [को०] । मार्मिकता । उ०-रागात्मक गुण के अतर्गत मर्मम्पणिता एव मजीवता की इन लोगो ने गणना की है। --शैली, पृ० ८८ । मर्मभेदी-वि० [ स० मर्मभेदिन् ] हृदय पर आघात पहुंचानेवाला । प्रातरिक कष्ट देनेवाला। जैसे,—आपको इस प्रकार की मर्भ- मर्मस्पर्शी-वि० [सं० मर्मस्पर्शिन् ] द० 'मर्मस्पृश्' । भेदी बातें न कहनी चाहिए। मर्मस्पृश्–वि० [ मे० ] हृदय को स्पर्श करनेवाना । हृदय पर प्रभाव मर्मभेदी २-सज्ञा पुं० बाण। तीर [को०] । डालनेवाला । मर्मस्पर्शी मर्ममय-वि० [ म० ] रहस्यपूर्ण । मर्मातक-वि० [ म० मर्मान्तक ] मन मे चुभनेवाला । मर्मभेदक । मर्मर'—सशा पुं० [ यू० ] दे० 'मरमर' । हृदयस्पर्शी । उ०-मानव दुर्गति की गाथा मे श्रोत प्रोत मर्मा- तक ।-ग्राम्या, पृ० १४ । मर्मर-मञ्चा पु० [ स०] १ पत्तो के चरमराने या हवा वा अन्य किसी कारण से उनके हिलने मे होनेवाला शब्द । २. एक प्रकार मर्मातिक-वि० [सं० मर्मान्तक ] दे० 'मर्मातक'। उ०-फिर का पहनावा [को०] । देता दृढ मंदेण देश को मर्मातिक, भाषा के बिना न रहती अन्य गध प्रातिक ।-अनामिका, पृ० ८६ । मर्मरित-वि० [ ] मर्मर की ध्वनि से युक्त। मर्माघात-सशा पुं० [सं०] मर्मस्थल पर आघात । मार्मिक मर्मरी-मशा स्त्री॰ [ स० ] १ एक प्रकार का देवदार वृक्ष । २. पीडा [को०] । हल्दी । ३ कान के बाह्य भाग की एक नस [को॰] । मर्मातिग-वि० [सं० ] मर्मस्थल पर पहुंचनेवाला । मर्म को वेधने- मर्मरीक-सज्ञा पुं० [स०] १ दरिद्र व्यक्ति। भिखारी। २ दुष्ट वाला (को०] । प्रादमी (को०] । मर्मानुभूति-संशा नी० [ सं० मर्म + अनुभूति ] मार्मिक अनुभूति । मर्मवचन-~मझा पुं० [हिं० मर्म + वचन ] वह बात जिससे सुननेवाले मर्मस्पर्शी अनुभूति । उ०—शुद्ध मर्मानुभूति द्वारा प्रेरित कुशल को प्रातरिक कष्ट पहुंचे। मर्मभेदी बात । उ०—मर्मवचन कवि भी प्राचीन पाख्यानों को बरावर लेते पाए है, और मव सीता तव बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला । —तुलमी भी लेते हैं।-रस., पृ० ६४। (शब्द०)। मर्मान्वेपण-सञ्ज्ञा पुं० [सं०] किसी बात का तत्व या गूढ़ रहस्य मर्मवाक्य-सज्ञा पुं० [सं० ] रहस्य को वात । भेद की या गूढ वात । जानना । तत्वानुसधान । मर्मवाणी-सशा स्त्री॰ [ सं० मर्म + वाणी ] भेदभरी वाणी। गूढ मर्माभास-सचा पुं० [ स० मर्म +भाभास ] रहस्यपूर्ण अनुभव । - PO +