पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 8.djvu/२४१

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मूसलधार ४००० मृग रहती है। २ एक अस्त्र जिसे बलराम धारण करते थे । ३, समान, बीच मे कमानदार और रोएंदार होती हैं। इसको राम वा कृष्ण के पद का एक चिह्न। शाखाएं बहुत धनी होती है और इसकी गाँठो मे में जड मुहा०-मूमल से या मूसलों ढोल बजाना = अत्यत पानद निकलकर जमीन मे जम जाती है। इसमे बैगनी या गुलाबी मनाना । अत्यधिक प्रसन्नता दिखाना । रग के छोटे छोटे फूल और चने के समान गोल फल लगते हैं जो पहले हरे अथवा बैंगनी रग के और पकने पर भूरे रंग मूसलधार-कि० वि० [हिं० मूसल +धार ] इतनी मोटी धार से, के हो जाते हैं। ये फ्ल चीरने पर दो दलो मे विभक्त हो गत जितना मोटा मूसल होता है। बहुत अधिक वेग मे। है और प्रत्येक दन मे से एक रीज निकलता है। इसके प्राय धारासार । जैसे, मूसलधार पानी वरसना । उ०-उसने आते ही ब्रजमंडल को घेर लिया और गरज गरज बडी बडी बूंदो मभी अंग प्रोपधि के रूप मे काम मे पाते हैं। विदोपत: चूहे के लगा मूसलधार जल बरसाने । लल्लू (शब्द॰) । विप को दूर करने के लिये इसे लगाया और इसका काढा पीया जाता है । वैद्यक मे यह चरपरी, कडवी, कसली, गीतल, हलकी, मूसलमानी-सञ्चा पुं० [अ० मुसल्मान ] दे० 'मुसलमान' । उ०-सेवा मानन भेदियन हिंदू मूसलमान ।-पृ० रा०, दस्तावर, रसायन तथा कफ, पित्त, कृमि, शूल, ज्वर, ग्रथि, मूजाक, प्रमेह, पाडु, भगदर और कोढ आदि रोगा को ६१/४६६ । दूर करनेवाली मानी जाती है। मूत्ररोग, उदररोग, हदय- मूसला-सञ्ज्ञा पुं० [हिं० मूसल ] वह जड जो मोटी और सीवी रोग प्रादि मे भी इसका व्यवहार होता है और यह रकशोधक कुछ दूर तक जमीन मे चली गई हो, जिसमे इधर उधर मूत या भी होती है। यह बड़ी और छोटी दो प्रकार की होती है । शाखाएं न फूटी हो । झखरा का उलटा । इसके अतिरिक्त इसके और भी कई भेद होते हैं, जिनमे से एक विशेष-जह दो प्रकार की होती है-एक झखरा दूसरी मूसला । भेद के पत्ते गोभी के पत्तो की तरह लवे और किनारे पर मूसली-सज्ञा पुं॰ [ स० मूशली ] १ हल्दी की जाति का एक पौवा । कटावदार होते हैं । एक पीर भेद ६ प जाति का होता है, विशेष-इसकी जड औपध के काम मे आती है और पुष्टई मानी जो एक मे चार फुट तक मेंचा होता है। इसका हठल जाती है। यह पौधा सीड की जमीन मे उगता है और नदियो पीला होता है, जिसमे से बहुत सी शाखाएं निकलती हैं। के कछारो मे भी पाया जाता है । बिलासपुर जिले मे अमरकटक इन सवका व्यवहार पथरी के समान होता है। इसे 'चूहाकाना' पहाड पर नर्मदा के किनारे यह बहुत मिलता है। भी कहते हैं। २. खल, इमामदस्ता आदि में किसी वस्तु को कूटने की छोटी मुंगरी पर्या-श्राखुफर्णी । द्रवती । मूपिकपी । मूपिकाहदा। या हडा। उदरकर्णी। मूसा-सज्ञा पुं॰ [ स० मूषक ] चूहा । मूसीकार-सञ्ज्ञा पुं० [अ० मूसीकार ] सगीत का अच्छा जानवार | मूसा-स्त्री० पुं० [ इयरानी ] यहूदी लोगो के एक पंगवर जिनको खुदा का नूर दिखाई पडा था। किताव या पंगवरी मतो का मूसीकी-सशा सी० अ० मूसोकी ] सगीतकला । गानविद्या [को०] । प्रादि प्रवर्तक इन्ही को समझना चाहिए। उ०—यूसुफ नवी मूहां-सज्ञा पुं० [ म० मुख ] दे० 'मुह' । उ०-देखतेहि काफिर को अमर न वारा। जेहि घर मां मूस अवतारा ।-हिंदी मूह फिरावे ।-कबीर सा०, पृ० १५१० । प्रेमगाथा०, पृ० २६२ । मृकंडु-मज्ञा पुं० [स० मृण्ड ] एक मुनि, जिनके पुत्र मार्कडेय मुहा०-मूसा भाग लेने गए थे पैगबरी मिल गई = करने क्या ऋपि थे। गए और क्या हो गया । मामूली चीज की कामना से जाने पर मृगक-सक्षा पुं० [सं० मृगा? ] हिरण्यकशिपु दानव । उ०- किसी को बहुत बडी वस्तु का मिल जाना। उ०-यजदानी मृगकस्य कर, नप तोरि तूर ।-पृ० रा०, २।१० इन्कार तो कर रहे थे, पर छाती फूल जाती थी। मूसा पाग मृगमाल-सा पुं० [ सं० मृगमाला ] मृगसमूह। उ०—कहूं वीन लेने गए थे, पंगबरी मिल गई। मान०, भा० १, पृ० १८७ । वादिन वाजत ऐसी। सुने राग मोह मृगगाल बसी ।-ह° मूसाई-सञ्ज्ञा पुं॰ [ इय० मूसा+ ई (प्रत्य॰)] मूसा द्वारा प्रवर्तित रासो०, पृ० ३७ । मत के अनुयायी । यहूदी। उ०—यद्यपि मूसाइयो और उनके मृग-सशा पुं० [सं०] [स्त्री० मृगी] १ पशुमात्र, विशेषत वन्य अनुगामी ईसाइयो की धर्मपुस्तक में आदम खुदा की प्रतिमूर्ति पशु । जगली जानवर । २ हिरन । बताया गया पर नर में नारायण की दिव्य कला का दर्शन विशेष-मृग नौ प्रकार के कहे गए हैं-मसूर, रोहित, न्यकु, भारतीय भक्तिमार्ग में ही दिखाई पड़ा।-रस०, पृ० ५५ । सवर, वभ्रुण, रुरु, शश, एण और हरिण । विशेष दे० 'हिरन' । मूसाकानी-सञ्ज्ञा स्त्री॰ [सं० मूषाकर्णी ] पोषध में प्रयुक्त होनेवाली ३ हाथियो की एक जाति जिसकी मांखें कुछ बडी होती है पौर एक प्रकार की लता जो प्राय. सारे भारत की गीली भूमि मे गडस्थल पर सफेद चिह्न होता है । उ०-च्यारि प्रकार चौमासे में पाई जाती है । चूहाकानी । पाखुकर्णी । पिप्षि बन बारन । भद्र मद मृग जाति सधारन ।-पृ० रा०, विशेष-इस लता की पत्तियां प्राकार में गोल और प्राय आधा २७।४ । ४ मार्गशीर्ष । प्रगहन का महीना। ५ मृगशिरा से डेढ इच तक की होती हैं, जो देखने में चूहे के कान के नक्षत्र । ६ एक यज्ञ का नाम । ७. मकर राशि । ८ अन्वेपण। सगीतज्ञ (को०] ।