पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 7.djvu/१८

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हिंदी शब्दसागर फ फ-हिंदी वर्णमाला में वाईसा व्यंजन भौर पवर्ग का दूसरा वर्ण । फंजिपत्रिका-संज्ञा स्त्री॰ [ सं० फञ्जिपत्रिका ] मूसाकानी। इसके उच्चारण का स्थान प्रोष्ठ है और इसके उच्चारण में फंजी-सज्ञा स्त्री॰ [ स० फञ्जिन् ] १. भारंगी या ब्रह्मनेष्टि नामक आभ्यंतर प्रयत्न होता है। इसे उच्चारण करने में जीम का क्षुप । २. मजीठ । ३. दती वृक्ष । अगला भाग होठों से लगता है। इसलिये इसे स्पर्श वर्ण फंट+-संज्ञा पुं० [ देशज ] दे० 'फणी' । कहते हैं। इसके बाह्य प्रयत्न, सवार, श्वास और अघोष हैं। इसकी गिनती महाप्राण में होती है । प, व, भ और म फंड' --संज्ञा पुं० [अं॰] वह धन या संपत्ति जो किसी नियत काम इसके सवर्ण हैं। में लगाने के लिये एकत्र की जाय । कोश । फंका-संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँक ] दे० 'फाक' । उ०—सिद्ध सो समृद्ध फंड-संज्ञा पुं० [सं० फण, प्रा० फड ] साप का फण । पाय सिद्ध से अघाय रहे केते परसिद्घ सब प्रगन को कर फंड'-संज्ञा पुं॰ [ सं० फएड ] पेडू । पेटो । पेट [को॰] । फंक ।-गोपाल (शब्द०)। फंद-संज्ञा पुं० [सं० बन्ध, हिं० फंदा १. बंध । बंधन । उ०- फंका-संज्ञा पुं० [ हिं० फाँकना, फाँक ] [ स्त्री० फकी ] १. सूखे (क) जा का गुरु है अंधरा चेला खरा निरंध । अंधे को अंधा दाने या दुकनी की उतनी मात्रा जितनी एक बार मुंह में . मिला परा काल के फंद।-कबीर (शब्द०)। (ख) सुनत फोकी जा सके। वचन प्रिय रसाल जागे अतिशय दयाल भागे जंजाल विपुल दुख कर्दम टारे। त्यागे भ्रम फंद द्वंद निरखि के मुखारविंद मुहा०-फंका करना = नाश करना । नष्ट करना । फंका सूरदास पति अनंद मेटे मद भारे । —सूर (शब्द०)। २. मारना - मुह में फंका डालना। रस्सी या बाल आदि का फंदा । जाल । फांस । उ०—(क) २. कतरा। टुकड़ा । खंड । उ०-केते घर घर के मायुध करके यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि विहसि उठो मति मंद । भूषन केते सरके संक भरे । तेहिं सूरज बंका दै रन हंका करि अरि सजति विलोकि मृग मनहु किरातिनि फंद।-तुलसी (शब्द०) फका दूरि करे। -सूदन (शब्द॰) । (ख) हरि पद कमल को मकरंद । मलिन मति मन मधुप फंकी -संज्ञा स्त्री॰ [हिं० फंका ] १. चूर्ण आदि की पुड़िया जो सूखी परि हरि विषय नर रस फंद।-(शब्द०)। ३. छल । फांकी जाय । फांकने की दवा । २. उतनी दवा जितनी एक घोखा । उ०-हनिही निशाचर वृद। बचिहें न करि बहु वार में फॉकी जाय। फंद ।-रघुराज (शब्द०)। ४. रहस्य । मर्म । उ०-पंडित फंकी संज्ञा स्त्री० [हिं० फॉक ] छोटी फांक । छोटा टुकड़ा । केरी पोथियां ज्यों तीतर को ज्ञान । पौरन शकुन बतावहीं फंग-संशा पुं० [सं० बन्ध या पञ्ज] १. बंधन । फंदा । उ०—(क) अपना फंद न जान ।-कबीर (शब्द०)। ५. दुःख । कष्ट । जाहु चली मै जानी तोकों। आबुहि पढ़ि लोनी चतुराई कहा उ.-शिव शिव जपत मन प्रानंद । जाहि सुमिरे विघन विन- दुरावति मोकों। एही प्रज तुम हम नंदनंदन दूरि कतहुँ नहि शत कटत जम को फंद (शब्द०)। ६. नथ की कांटी फंसाने जैहो। मेरे फंग कबहुं तो परिहो मुजरा तबही दैहो । -सूर का फंदा। गूज । उ०-मदमाती मनोज के पासव सों अंग्न (शब्द०)। (ख) शोभा सिंधु संभव से नौके नीके नग हैं मातु जासु मनों रंग केसरि को| सहजे नथ नाफ ते खोलि घरी पितु भाग बस गए परि फंग हैं।—तुलसी (शब्द॰) । २. कहो कौन घों फंद या सेसरि को।-कमलापति (शब्द॰) । राग । अनुराग । उ०-सुनत सखी तह दौरी गई । सुने श्याम फंदना-क्रि० प्र० [सं० बन्धन चा हिं० फंदा ] फंदे में पड़ना । सुखमा के पाए धाई तरुणि नई । कोउ निरखति मुख कोउ फंसना । उ०-(क) मास पास जग फंदियो रहै उरघ निरखति भंग कोउ निरखति रंग और। रैनि फंग कहुं पगे लपटाय । राम पास पूरन करे सकल पास मिट जाय ।- कन्हाई कहति सबै करि रौर ।-सूर (शब्द०)। कबीर (शब्द॰) । (ख) मोको निदि पर्वतहि बंदत । चारी फंजिका-संज्ञा स्त्री० [सं० फजिका] १. भारंगी या ब्राह्मण यष्टिका कपट पंछि ज्यों फंदत ।- सूर (शब्द०)। नाम का क्षुप। २. देवताड़। ३. जवासा । हिंगुवा। फंदना-क्रि० स० [हिं० फाँदना ] फांदना। लांधना। उल्लंघन ४. दंती वृक्ष! करना।