पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 7.djvu/१७७

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यसवार' ३४१६ बसीठ वसवारी --संज्ञा पुं० [हिं० वास ( = सुगंध) + वार (प्रत्य॰)] वनि पायो । नूपुर जनु मुनिवर कलहंसनि रचे नीड़ दे बाह छौक । वघार । वसायो ।-तुलसी (शब्द०)। वसवार-वि० सोवा । सुगंधित । उ०-करुए तेल कीन्ह वसवारू । बसाना@४-क्रि० अ० [हिं० वश से नामि० धा० ] वश चलना। मेयी कर तब दीन्ह बघारू । —जायसी (शब्द॰) । जोर चलना । काबू चलना । अधिकार या शक्ति का काम बसह - संज्ञा पु० [सं० वृपभ, प्रा० यसह ] वैल । उ०-(क) कर देना । उ०—(क) घट में रहै सूझ नही कर सौ गहा न त्रिशूल मरु डमरु विराजा। चले वसह चढि बाजहिं बाजा । जाय । मिला रहै पो ना मिले तासों कहा बसाय ।-कबीर तुलसी (शब्द०)। (ख) अमरा शिव रवि शशि चतुरानन (शब्द॰) । (ख) काटिय तासु जीभ जो वसाई । सबन मूदि हयगय बसह हंस मृग जावत । धर्मराज वनराज अनल दिव नतु चलिय पराई । —तुलसी (शब्द॰) । (ग) करो री न्यारी शारद नारद शिव सुन भावत ।-सूर (शब्द०)। हरि आपन गया । नहिन बसात लाल कछु तुम सों सबै ग्वाल व सही-संज्ञा स्त्री॰ [ स० वसति, प्रा. वसहि, बसइ ] १. घर । इक ठयां । सूर (शब्द०)। २. स्त्री । पत्नी। उ०-और सब सामंतन की वसही आनी । बसाना -कि० अ० [हिं० बास ] १. वास देना । महकना । कितकों प्रांननै मानी ।-पृ० रा०, १६/११४ । उ०-(क) वैलि कुढंगी फल बुरी फुलवा कुबुधि बसाय । बसाँधा-वि० [हिं० बास ] बासा हुप्रा । सुगचित । मूल विनासी तूमरी सरो पात व रु प्राय ।-कवोर (शब्द०)। बसा'-संज्ञा स्त्री० [सं० वसा ] दे० 'वसा' । (ख) धूमउ तजइ सहज करुणाई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई । वसा-मज्ञा स्त्री० [ देश० ? ] १. बर। भिड़ । वरटी। उ०- तुलसी (शब्द०)। २. दुर्गध देना । वदवू देना । उ०-मद बसा लंक बरनी जग झोनी। तेहि ते अधिक लक वह जस मंद बसाइ पसेऊ। प्रो विसवासि छरै सब कोक । खीनी । —जायसी (शब्द॰) । २. एक प्रकार की मछली । —जायसी (शब्द०)। बसात-सज्ञा पु० [हिं०] दे० विसात' । वसाहनाल-क्रि० स० [हिं० विसाहना] खरीदना । क्रय करना। उ०-वसाहंति षीसा पइजल्ल मोजा। भमे मीर वल्लीप बसाना-क्रि० स० [हिं० 'वसना' का सकर्मक तथा प्रे० रूप ] १. सइल्लार षोजा ।-कीर्ति०, पृ० ४० । वसने देना। बसने के लिये जगह देना। रहने को ठिकाना देना। जैसे,—राजा ने उस नए गांव में बहुत से वनिए बसिवाना@-क्रि० प्र० [हिं० बासा ] दे० 'वसियाना' । बसाए । बसिौरा-संज्ञा पुं० [हिं० पासी + और (प्रत्य०)] १. वर्ष की संयो॰ क्रि०-देना ।-लेना । कुछ तिथियां जिनमें स्त्रियां वासी भोजन खाती और वासी पानी पीती हैं। २. बासी भोजन । २. जनपूर्ण करना । आबाद करना । जैसे,—गांव बसाना, शहर बसाना । उ०—(क) केहि सुकृती केहि घरी बसाए । बसिठg.-सज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'वसीठ' । उ०-उतरि बसिठ धन्य पुण्यमय परम सुहाए।-तुलसी (शब्द॰) । (ख) नाद दुइ आइ जोहारे । —जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २६७ । तें तिय जेंवरी ते सांप करि घाल घर वीथिका बसावति वनन बसिया - वि० [ हिं• बासी+इया (प्रत्य॰)] दे० 'वासी' । की । -केशव (शब्द०)। बसियाना-क्रि० प्र० [हिं० बासी, या यसिया+ना (प्रत्य०) ] संयो॰ क्रि०-देना ।-लेना । बासी हो जाना । ताजा न रह जाना। मुहा०-घर बसाना = गृहस्थी जमाना । सुखपूर्वक कुटुंब के बसिष्ठ-संज्ञा पुं० [सं० ] दे० 'वसिष्ठ' । साथ रहने का ठिकाना करना। वसीफत-संज्ञा स्त्री॰ [हिं० बसना ] १. वस्ती। आवादी । २. ३. टिकाना । ठहराना। स्थित करना । जैसे, -रात को इन वसने का भाव या क्रिया। रहन । मुसाफिरो को अपने यहां बसा लो। बसीकर-वि० [सं० वशीकर ] वशीकर | वश में करनेवाला । मुहा०-मन में बसाना = चित्त में इस प्रकार जमाना कि उ०–रसखानि के प्रानसुधा भरिवो अधरान पै त्यों अघरा वरावर ध्यान में रहे । हृदय में अंकित कर लेना । उ०- धरिबो। इतने सब मैन के मोहनी यंत्र मंत्र वसीकर सी व्यासदेव जव शुकहि सुनायो। सुनि के शुक सो हृदय करिवो ।-रसखानि (शब्द०)। वसायो । सुर (शब्द॰) । घसीकरन@-- संज्ञा पु० [ स० वशीकरण ] दे० 'वशीकरण' । वसाना२-क्रि० प्र० बसना । ठहरना । रहना । उ०-बालक बसीगत-सज्ञा स्त्री० [हिं० बसना ] दे० 'वसीकत' । अजाने हठी मौर की न मानै बात विना दिए मातु हाथ वसोठ-ज्ञा पुं० [ स० अवसृष्ट, प्रा० अवसिह ] भेजा हुमा दूत । भोजन न पाय है । माटी के बनाए गज वाजी रथ खेल माते संदेसा ले जानेवाला। उ०—(क) प्रथम बसीठ पठव सुनु पालन बिछौने तापै नेक न बसाय है । हनुमान (शब्द०) । नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।-तुलसी (शब्द०)। बसाना-क्रि० स० [सं० वेशन, पू०हिं० वैसाना ] १. बिठाना । (ख) मधुकर तोहिं कौन सों हेत। ...अति शठ दीठ बसीठ २. रखना । उ०-बधुक सुमन पद पंकज अंकुस प्रमुख चिह्न श्याम को हमे सुनावत गीत ।—सूर (शब्द॰) । (ग) जूझत