पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 7.djvu/१७१

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बलासी पलिनी बलासी-वि० [ स० वलासिन् ] यक्ष्मापीड़ित । क्षयग्रस्त । उ०-(क) तात जाऊँ वलि वेगि नहाहू जो मन भाव वलाह'-संज्ञा पु० [सं०] जल । सलिल [को०] । मधुर वछु खाहू ।-तुलसी (शब्द॰) । (ख) कौशल्या प्रादिक महतारी भारति करत बनाय । यह सुख निरखि मुदित सुर बलाहर-संज्ञा पुं० [सं० बोल्लाह ] वह घोड़ा जिसकी गरदन और दुम के दाल पीले हो । बुल्लाह । उल-हरे कुरंग महुअ बहु नर मुनि सूरदास वलि जाय।—सूर (शब्द०)। यलि जाऊँ या बलि = तुम पर निछावर हूँ। (वात चीत में स्त्रिया इस भांती । गुरं कोकाह वलाह सो पाती।-जायसी नं०, वाक्य का व्यवहार प्रायः यों ही किया करती हैं)। उ०- (गुप्त), पृ० १५० । छवै छिगुनी पहुंचौ गिलत अति दीनता दिखाय । वलि वावन बलाहक-संज्ञा पुं० [सं०] १. मेघ । बादल । २. एक दैत्य । ३. को व्योंत सुनि को वलि तुम्हें पताय ।-विहारो (शब्द०)। एक नाग । ४. सुश्रुत के अनुसार दर्वीकर जाति के सांपों के १. चंवर का दंड । १०. पाठवें मन्वंतर में होनेवाले इंद्र का छब्बीस भेदो में एक का नाम । ५. कृष्णचंद्र के रथ के एक नाम । ११. असुर।-अनेकार्थ०, पृ० १४४ । १२. विरोचन के घोडे फा नाम । ६. मोघा। ७. लिंगपुराण के अनुसार पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र का नाम । यह दैत्य पाति का शाल्मलि द्वीप के, और मत्स्यपुराण के अनुसार कुश द्वीप के राजा था। विष्णु ने वामन अवतार लेकर इसे छल कर एक पर्वत का नाग। ८. महाभारत के अनुसार जयद्रथ के पाताल भेजा था। एक भाई का नाम । ६. एक प्रकार का बगला । वलिर-संशा ग्री० [सं०] १. 'बलि'। २. चमड़े की झुरीं । वनाहरी- संज्ञा पुं० [हिं० बुलाना ] गाँव में होनेवाला वह कर्मचारी ३ स्त्रियों की नाभि के ऊपर की रेखा (को०)। ४. एक जो दूसरे गांवों मे संदेसा ले जाता, गांव में पाए हुए लोगों की सेवा सुश्रूषा करता और उन्हें मार्ग दिखलाता हुआ दूसरे प्रकार का फोड़ा जो गुदावर्त के पास प्रादि रोगों में उत्पन्न होता है । ५. अशं फा मस्सा । ६. मकान की छाजन गाँव तक ले जाता है। का छोर या किनारा (को०)। ७. लक्ष्मी ।-अनेकार्थ, बलिंदम- संज्ञा पुं० [सं० घलिन्दम ] विष्णु । पृ० १४४1 बलि'- संज्ञा पु० [सं०] १. भूमि की उपज का वह अंश जो भूस्वामी बलि:-संशा सी० [सं० पला (= छोटी यहिन') ] ससी । उ- प्रतिवर्ष राजा को देता है। कर । राजकर । ताकि रहत छिनौर तिय लेत मौर फो नाउँ। ए धमि विशेष-हिंदू धर्मशास्त्रों में भूमि की उपज का छठा भाग राजा ऐसे बलम को विविध माति वति जाउँ ।-पाकर का अंश ठहराया गया है। (शब्द०)। २. उपहार । भेंट । ३. पूजा की सामग्री या उपकरण। ४. वलिक-सशा पुं० [सं०] १. एक नाग का नाम । २. वह व्यक्ति जो पंच महायज्ञो मे चौथा भूतयज्ञ नामक महायज्ञ । प्रति छठे दिन भोजन करता है (को०) । विशेष—इसमे गृहरयों को भोजन में से ग्रास निकालकर घर के बलिफर-वि० [सं०] १. बलि करनेवाला । २. सिकुड़न या मुर्रा भिन्न भिन्न स्थानों में भोजन पकाने के उपकरणो पर तथा पैदा करनेवाला । ३. करदाता [को०] । काक आदि जंतुओं के उद्देश्य से घर के बाहर रखना बलिकर्म-सशा पुं० [सं० बलिकर्मन् ] बलिदान । होता है। बलित-वि० [हिं० बलि ] बलिदान चढ़ाया हुधा । हत । मारा ५.किसी देवता का भाग । किसी देवता को उत्सर्ग किया कोई हुआ। उ०-बलित प्रवेर कुबेर बलिहि गहि देहुँ इंद्र प्रव । खाद्य पदार्थ । ६. भक्ष्य । अन्न । खाने की वस्तु । उ०—(क) विद्याधरन अविद्य करी बिनु सिद्धि सिद्ध सव ।-केशव वैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि सस चहै नाग अरि (शब्द०)। भागू।-तुलसी (शब्द०)। (ख) पाए भरत दीन ह बोले चलित-वि० [सं० वलित ] दे० 'वलित'। उ०-भाग्यो कहा कियो कैकेयी माई। हम सेवक वा त्रिभुवनपति के सिंह को बलि कौवा को खाई।-सूर (शब्द०)। ७. चढ़ावा । सुलतान जान वचत न जानि बेगि, वलित बितुड पै विराजि बिलखाइ के ।-हम्मीर०, पृ० ४० । नैवेद्य । भोग । उ०-पर्वत सहित धोइ प्रज ढारी देठे समुद्र बलिदान--संज्ञा पुं० [सं०] १. देवता के उद्देश्य से नैवेद्यादि पूजा की वहाई । मेरो बलि औरहि ले पर्वत इनको करौं सजाई।- सूर (शब्द॰) । (ख) बलि पूजा चाहत नही चाहत एक प्रीति । सामग्री चढ़ाना। २. बकरे प्रादि पशु देवता के उद्देश्य से मारना। सुमिरन ही मानै भलो यही पावनी रीति ।- तुलसी (शब्द०)। 5. वह पशु जो किसी देवस्थान पर या किसी देवता के उद्देश्य क्रि० प्र०--करना ।—होना । से मारा जाय। बलिद्विप-संज्ञा पु० [ स०] बलि के शत्रु-विष्णु । क्रि० प्र०—करना ।-देना।—होना । बलिध्वंसो-संशा पुं० [सं० बलीध्वंसिन् ] विष्णु [को०] । मुहा०-बलि चढ़ना = मारा जाना । बलि चढ़ाना = बलि देना। बलिनंदन-सज्ञा पुं॰ [ स० पलिनन्दन ] वाणासुर । देवता के उद्देश्य से घात करना ।-देवार्पण के लिये बध घलिनी-संज्ञा स्त्री॰ [स०] १. प्रतिवला नाम की घोषषि । २. करना । बलि जाना = निछावर होना। बलिहारी जाना। बरियरा [को०] ।