पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 6.djvu/४६

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पगार पगड़ी २७५५ पगडी-सञ्ज्ञा स्त्री० [म० पटक, हिं० पाग+ड़ी (प्रत्य॰)] वह स्नान कराकर, पगरखी तथा कमली आदि नई मंगवा दी। लबा कपडा जो सिर लपेटकर वाँधा जाता है। पाग । -भक्तमाल ( प्रिया० ), पृ० ५६२ । चीरा। साफा । उष्णीष । पगरना-सञ्ज्ञा पुं॰ [देश॰] सोने चांदी के नक्काशो का एक औजार जो नक्काशी करते समय छोटा गड्ढा बनाने के काम में आता है। क्रि० प्र०-बँधना ।-वाँधना । मुहा०-( किसी से ) पगडी अटकना = बराबरी होना । मुका- पगरा-मज्ञा पु० [ हि० पग+रा (प्रत्य॰) ] पग । डग । कदम । बला होना। पगड़ी उछलना = दुर्गति होना। बुरी नौवत उ०-सूर सनेह ग्वारि मन अटको छाँडिहु दिए परत नहिं पाना। पगढी उछालना = (१) वेइज्जती करना। दुर्दशा पगरो। परम मगन है रही चितै मुख सबही ते भाग याहि को अगरो।—सूर (शब्द॰) । करना। (३) उपहास करना। हँसी उडाना। पगड़ी उतरना = मान या प्रतिष्ठा भग होना। वेइज्जती होना। पगरा-सज्ञा पु० [फा० पगाह (= सबेरा) ] यात्रा प्रारंभ करने पगडी उतारना = (१) मान या प्रतिष्ठा भग करना। बेइ- का समय। प्रभात । चलने का समय । सवेरा । तडका। ज्जती करना । (२) वस्त्रमोचन करना । ठगना । लूटना। उ०-(क) पौ फाटी पगरा हुआ जागे जीवा जून । सब काहू घन सपत्ति हरण करना। (किसी को ) पगड़ी बँधना = को देत हैं चोच समाना चून। -कवीर (शब्द०)। (ख) (१) उत्तराधिकार मिलना । वरासत मिलना। (२) उच्च कबिरा पगरा दूर है, बीच परी है राति। ना जाने क्या पद या स्थान प्राप्त होना। सरदारी मिलना। अधिकार होयगा ऊगता परभात ।-कवीर (शब्द०)। प्राप्त होना। ( ३ ) प्रतिष्ठा मिलना । सम्मान प्राप्त होना। पगरी-सञ्ज्ञा मी० [हिं पाग ] दे० 'पगडी' । उ०-प्यार पगी पगरी (स्सिी को) पगढ़ी वाँधना = (१) उत्तराधिकार देना। पिय की घर भीतर आपने सीस सँवारी। -मति० ग्र०, गद्दी देना। (२) उच्च पद या अधिकार देना। सरदार पृ० ३४५ बनाना। (किसी के साथ ) पगढ़ी बदलना = भाई चारे पगला-वि० पु० [हिं० ] [ वि० सी० पगली ] दे० पागल'। का नाता जोडना । मैत्री करना। (किसी की) पगड़ी रखना = मानरक्षा करना । इज्जत बचाना । (किसी के प्रागे) पगवाहा-सज्ञा पुं० [हिं० पग+सं० वाहन] पैदल सेना । उ॰—वागा ली विचित्रों पगवाहाँ।-रा० रु०, पृ० ३३४ । पगडी रखना = बहुत नम्रता करना । गिडगिडाना । हा हा पगहा।-सज्ञा पुं० [सं० प्रग्रह, मा० पग्गाह ] [खी० पगहो] वह रस्सी खाना। जिससे पशु बांधा जाता है। गिरावं । पचा। पगतरी -सञ्ज्ञा भी० [हि. पग+तल ] जूता । पगा-सञ्ज्ञा पुं॰ [हिं० पाग] १ पटका । दुपट्टा । उ०-झगा झगा पगदासी-सच्चा स्री० [हिं० पग + दासी ] १ जूता । २ खडाऊँ अरु पाग पिछोरी ढाढिन को पहिराए । —सूर (शब्द०)। उ०-देखि द्वार भीर, पगदासी कटि बाँधी धीर, कर सो २ पाग। पगडी। पाग। उ०—सीस पगा न झगा तन उछीर करि, चाहे पद गाइये । भक्तमाल (प्रिया० ), मे प्रमु जाने को प्राहि बसे किहि ग्रामा। -कविता को०, पृ०४८६ । भा०१, पृ० १४६ । पगना-क्रि० स० [सं० पाक ] १ शरवत या शीरे में इस प्रकार पगा-सञ्ज्ञा पु० [सं० प्रग्रह] दे० 'पघा'। उ०-तृण दशनन ले मिलु पकना कि शीरा चारो ओर लिपट और घुस जाय। रस के दसकधर कठहिं मेलि पगा।—सूर (शब्द०)। साथ परिपक्व होकर मिलना। जैसे, पेठे का चीनी मे पगना पगा-सञ्चा पुं० [हिं पगरा] दे० 'पगरा' । २ किसी लसलसे पदार्थ के साथ इस प्रकार मिलना कि वह उसमें भर जाय । सनना। रस आदि के साथ अोतप्रोत होना । पगाना-क्रि० स० [स० पक्व या पाक] १ पागने का काम कराना। ३ बहुत अधिक अनुरक्त होना। किसी के प्रेम में इवना । २ अनुरक्त करना। मग्न करना। उ०—का कियो योग अजा- मग्न होना। उ०-कहैं पद्माकर पगी यो पतिप्रेम ही मे, मिल जू गनिका कबही मति प्रेम पगाई ।-तुलसी (शब्द॰) । पदमिनी तोसी, तिया तोही पेखियत है।-पद्माकर (शब्द॰) । पगार-संज्ञा पुं॰ [ स० प्राकार ] गढ, प्रासाद या बाग बगीचे के संयो॰ क्रि०-जाना । रक्षार्थ बनी हुई चहारदीवारी। रखवाली के लिये बनी हुई दीवार । प्रोट की दीवार । उ०—(क) बीथिका वजार प्रति ज-सज्ञा श्री० [सं० पग+नियाँ (प्रत्य॰)] जूती। उ.- अटनि अगार प्रति पंवरि पगार प्रति वानर विलोकिए ।- तानिया न तिलक मुथनियाँ पगनियाँ न घामै घुमराती छोडि तुलसी (शब्द॰) । (ख) नांघती पगारन नगारन की धमकै । सेजिया सुखन की।-भूषण (शब्द॰) । -भूपण (शब्द०)। पगपान-सज्ञा पु० [हि. पग+पान ] पैर मे पहनने का एक भूषण पगार-सज्ञा पु० [हिं० पग+ गारना] १ पैरो से कुचली हुई मिट्टी, जिसे पलानी या गोडसकर भी कहते हैं। उ०—पगपान चाँदी कीचड वा गारा । २ ऐसी वस्तु जिसे पैरो से कुचल सकें। ३ को चरन पहिनन लागी सोभा देखि रभा रति गहू गरत वह पानी वा नदी जिसे पैदल चलकर पार कर सकें। पायाव। सो।-भारतेंदु ग्र०, भा०२, पृ० ८२४ । उ०-गिरि ते ऊँचे रसिक मन वूडे जहाँ हजार । वहै सदा पसु पगरखी@t-सज्ञा स्त्री० [हिं० पग+रखी ] खडाऊँ। पादत्राण । नरन को प्रेम पयोधि पगार ।-(शब्द॰) । पगतरी। उ०-इनको अच्छी प्रकार से अग मांज मांज के पगार-सञ्ज्ञा पुं० वेतन । तनख्वाह ।