पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 6.djvu/२१६

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पाई २६२५ पाकजात मि०प्र०-देना ।—लगाना । ६. पिटारी जिसमे स्त्रियां अपने घाभूपणादि रखती हैं । १० छापे के घिसे हुए और रद्दी टाइप । (मुद्रण) । मुहा०-पाई करना = (१) घिसे और वेकार टाइपों को एक में मिला देना। (२) छापे मे प्रयुक्त टाइपो को एक मे इस तरह मिला देना कि उनको अलग अलग न किया जा सके। पाई होना = मुद्रण में प्रयुक्त टाइपो का बेकार हो जाना। पाई-मग ग्री० [हिं० पाया (=पाई कीदा) ] एक छोटा लया कीडा जो धुन की तरह बन्न यो, विपत घान को, खा जाता अथवा खगव कर देता है और उसे जमने योग्य नहीं रहने देता। क्रि० प्र०-लगना। पाइतास पुं० [देश॰] एक वर्णवृत्त जिसमें एक मगरण, एक भगण और एक सगण होता है। पाउंड-श पुं० [म.] १ नोने का एक अग्रेजी सिमा जो २० शिलिंग पा होता है और पहले १५) का माना जाता था, फिर १०)पा, परतु अब १३) का ही माना जाता है । इसका गाव घटना यता रहता है। पर इसका प्रचलन नहीं है। कागज का ही पौंड नोट चलता है। २ एक घग्रेजी तौल जो लगमा ७ घटक के होती है। पाउँ+-T पुं० [ मं० पाद ] दे० 'पा'। उ०—जेन्हे प्रत्पिजन विमन न किजिन, जेइ मतत्य न भणिमा, जेदन पाउँ उमग दिजिए। पीति०, पृ०१०। पाउँदा-सरा पुं० [हिं० पाय +5] पाडा' । उ०-पीर पुरेलन भीर मन नीर गभीर मझाइ। करि पन्नग पाउँरे पिय पै पढेंची जाः।-स० गप्तक, पृ० ३६० । पा-पुं० [म. पाद] १२० 'पा'। उ०-पाही तोहि निघन गठ, है गंढ सात घटाउ। फिग न कोई जित जिउ, मग पथ दै पाउ !-जायसी ग्रं॰, पृ० २६४ । २. चतुर्थाश । वा पकाने की क्रिया या भाव । ३ पका हुआ अन्न। रसोई। पकवान । उ०-भोजन भूजाई विवघ, विजन पाक सुरंग । रा० रू०, पृ० ३०३ । यो०-पाककर्म, पाकक्रिया = पकाना । रीघना । पकाने का काम। पाकपंडित= रसोई बनाने में दक्ष । पाकपात्र = दे० 'पाकभाड' । पाकपुटी। पाकमांड। पाकशाला । पाकागार । ४ वह प्रोषध जो मिस्री, चीनी या शहद की चाशनी में मिला- कर बनाई जाय । जैसे, शुठी पाक । ५ खाए हुए पदार्थ के पचाने की क्रिया। पाचन । यो०-पाकस्थली। ६ एक दैत्य जिसे इन्द्र ने मारा था। यो०-पाकरिपु । पाकशामन । ७ वह खीर जो श्राद्ध में पिंडदान के लिये पकाई जाती है। ८. फोडा । ग्रण (को०) । ६ परिणति। फल । नतीजा (को०)। १० उलूक । उल्न (फो०)। ११ वृद्धावस्था के कारण फेशो का श्वेत होना (को०) । ११ गृह्याग्नि । गृह की अग्नि (को०)। १२ पाप का पात्र (को०)। १३ अनाज । अन्न (को०)। १४ बुद्धि की परिपक्व अवस्था (को०) । १५ भीति । घातक (ले०)। १६ उलट फेर । परिवर्तन (को०)। पाकर-पि० । पक्व । पका हुआ। २ स्वल्प । लघु। अल्प । ३ बुद्धिमान् । जिसकी बुद्धि परिपक्व हो। ४ प्रशंसा के योग्य । ५ अकृत्रिम । निष्कपट । शुद्धात्मा। ६ प्रज्ञ । अनभिज्ञ । अप्राश [को०]। पाफर-वि० [फा०] १ पवित्र । शुद्ध । सुयरा । परिमार्जित । मुहा०-पाक फरना = (१) धार्मिक विधि के अनुसार फिसो वस्तु गो घोकर शुद्ध करना। (२) जवह किए हुए पशु या पक्षी के पास से पर, रोएँ यादि दूर करना २ पापरहित । निमंल । निर्दोष । यौ०-पाकदामन । पाकसाफ । ३ जिमका कोई अग पोप न रह गया हो । समाप्त । वेवाक । मुहा०-फगदा पाक करना = (१) पिसी ऐसे कार्य को समाप्त कर डालना जिसके लिये विशेष चिता रही हो। (0) किसी बाधा को हटाकर या शशु को मारकर निश्चित हो जाना। झगडा ते होना । कोई कार्य मगाप्त हो जाना। कोई वाधा दूर हो जाना । (३) मार डालना। ४. माफ । जैसे-यह सब झगडा से पाक है। पाककृष्ण-सा मी० [सं०] १. जगली करोंदा । २ करज । पाकज-सा पुं० [सं०] १ कचिया नमक । २ भोजन के बाद होनेवाली उदरपीडा । परिणामणूल (को०)। पाफजात-वि० [ फा० पाकजाद ] शुद्धात्मा। पविधात्मा। जिसकी प्रात्मा स्वच्छ हो। उ०-जीव ने पहचान लिया पाफजात, जिससे है कायम यह कुल का ए नात ।-कवीर म०, पृ०४६ । पार। पाउष्टर-77 ० [अ०] १ फोई वस्तु जो पीमार धूल के समान कर दी गई हो । चूर्ण । युग्नी । २ एक प्रकार का विलायती बना हुया मसाला या पूर्ण जो प्राय स्त्रियाँ और नाटक के पान अपने चेहरे पर रगत बदलने पौर शोभा बढ़ाने के लिये लगाते हैं। पाऊँ- सहा पुं० [सं० पाद, प्रा० पान, पाश्र, पाउँ ] पर । उ०- गूगा हुपा यावला, बहन हुपा पान । पाऊँ थे पगुल भया, मतगुर मारघा बान ।योर प्र०, पृ० १० । पाएला-वि० [हिं० पैदल ] पदाति या पैदल चलनेयाली (सेना)। उ.-अठारह लाख फौद है एता। तुरुकी साजी पाएल केता।-रा० दरिया, पृ० १३ । पाक-सज्ञा पुं० [सं०] १ पकाने की क्रिया। रीधना। २ पकने