पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 10.djvu/३६५

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, सुनंदा ६०८५ सुमेसभि सुनदा-मज्ञा स्त्री० [सं० सुनन्दा १ उमा। गौरी। २ उमा को एक मुहा० मुनी अनसुनी कर देना = कोई बात सुनकर भी उसपर सखी। ३ कृष्ण की एक पत्नी। ४ वाहु और बालि की ध्यान न देना। किसी बात को टाल जाना। सुनी सुनाई माता। ५ चेदि के राजा सुबाहु की बहन । ६ सार्वभौम जिसे केवल सुनकर जाना गया हो, प्रत्यक्ष देखा न गया हो । दिग्गज की पत्नी । ७ दुष्यत के पुत्र भरत की पत्नी। ८ प्रतीप जैसे, सुनी सुनाई वात । की पत्नी । ६. एक नदी का नाम। १० मर्वामिद्धि नद की वडो २ किमी के कथन पर व्यान देना। किसी की उक्ति पर ध्यान- स्त्री । ११ राफेद गी। १२ गोरोचना । गोरोचन । १३ अर्क पूर्वक विचार करना। कान देना । जैसे,-कथा सुनना, पाठ पत्नी । इसरोल । १४ एक तिथि । १५ नारी । स्त्री । औरत । सुनना, मुकदमा सुनना। ३ भली वुरी या उलटी सोधी वाते सुदिनी-सज्ञा स्त्री० [स० सुनन्दिनी) १ आरामशीतला नामक श्रवण करना । जैसे,—(क) मालम होता है, तुम भी कुछ पवशाक । २ एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण मे 'स सुनना चाहते हो । (ख) जो एक कहेगा, वह चार सुनेगा। जस जग' रहते हैं। इसे प्रबोधिता और मजुभाषिणी भी सुनफा-सज्ञा स्त्री॰ [म०] ज्योतिष का एक योग । कहते हैं। विशेष -सूर्य के अतिरिक्त जब कोई ग्रह चद्रमा के बाद द्वितीय मुना- वि०, सज्ञा पु० [स० शून्य] दे० 'सुन्न' । स्थिति मे आ बैठता है तव 'सुनफा योग' होता है। सुनका-सञ्ज्ञा पु० [देश०] चौपायो का एक रोग जो उनके कठ मे सुनबहरा-वि० [हिं० सुनना + बहरा] पूरी तरह सुनकर या श्रवण होता है । गरारा । घुरकवा। करके भी बधिर का सा आचरण करना। सुनकर भी न सुनने का भाव व्यक्त करना। सुनकातर-सञ्ज्ञा पुं० [स० स्वन, हिं० सोन + कातर] १ एक प्रकार का साँप । सुनबहरी-सज्ञा भी० [हि० सुन्न + बहरी ?] १ एक प्रकार का रोग सुनकिरवा-तज्ञा पु० [हिं० सोना + किरवा ( = कोडा)] एक प्रकार जिसमे पैर फूल जाता है। श्लीपद । फोलपा। २ एक प्रकार का का कीडा जिसके पर पन्ने के रग के होते है। उ० - गोरी गद- कुष्ठ रोग जिसमे रोग से आक्रोत अग या शरीर का भाग सुन्न हो कारी परे हँसत कपोलनि गाड । कैसी लसति गँवारि यह सुन- जाता हे और वहाँ स्पर्श या आघात की अनुभूति नही होती। किरवा की प्राड । -विहारो (शब्द०)। २१ एक प्रकार का क्षुप । सुनय-मज्ञा पु० [स०] १ सुनीति । उत्तम नीति । २. सदाचार । मुनक्षत्र'-सज्ञा पु० [म.] १ उत्तम नक्षत्र । २ एक राजा का नाम सद्व्यवहार (को०) । ३ परिप्लव राजा का पुत्र । ४ ऋत का जो मम्देव का पुत्र था। ३ निरमिन का पुत्र । एक पुत्र । ५. खनिन का पुन । मुनक्षत्र'-उत्तम नक्षत्रवाला। सुनयन'-सज्ञा पुं० [स०] मृग । हरिन । सुनक्षत्रा-सज्ञा स्री० [स०] १ कर्म मास का दूसरा नक्षत्र । २ सुनयन' - वि० [ली सुनयना] सु दर आँखोवाला । सुलोचन । कार्तिकेय की एक मातृका। सुनयना सञ्ज्ञा स्त्री० [म०] १ राजा जनक की पत्नी । २ नारी। स्त्री। सुनख-सज्ञा पु० [देश॰] एक प्रकार का धान जो आश्विन के अत औरत । ३ सुदर नेनोवाली स्त्री (को०)। और कार्तिक के प्रारभ मे होता है। सुनर-मशा पुं० [म० सु + नर] १ अर्जुन । (डिं० ) । २ सुदर पुरुष । सुनगुन-सञ्ज्ञा स्त्री० [हिं० सुनना + अनु + गुन] १ किसी बात का सुनरिया-सज्ञा स्त्री॰ [म० सुन्दरी, सु + नरी + इया (प्रत्य॰)] सुदर भेद । टोह । सुराग। नारी। सुदर स्त्री। उ०-प्यारे की पियरिया जगत से क्रि० प्र०-मिलना ।--लगना । नियरिया सुनरिया अनूठी तोरी चाल ।-बलवीर (शब्द॰) । २ कानाफूसी । अस्पष्ट चर्चा । सुनरी -सज्ञा स्त्री० [स० सुन्दरी] दे॰ 'सुनरिया' । सुनजर-वि० [स० सु + फा० नजर] दयावान् । कृपालु । (डिं०)। सुनद-वि० [स०] गभीर गर्जन या नाद करनेवाला [को॰] । सुनत'-तशा स्त्री० [अ० मुन्नत] दे॰ 'सुन्नत' । सुनवाई - सज्ञा स्त्री० [हिं० सुनना + वाई (प्रत्य॰)] १ सुनने की सुनत'---वि० [स०] अत्यत नम्र या झुका हुअा। क्रिया या भाव । २ मुकदमे आदि का पेश होकर सुना जाना । सुनति-मज्ञा क्षी० [अ० सुन्नत] दे० 'सुन्नत' । उ०-(क) जो ३ किसी शिकायत, फरियाद आदि का सुना जाना । जैसे, तुम तुरुक तुरकिनी जाया। पेट काहे न सुनति कराया।--कवीर लाख चिल्लाया करो, वहाँ कुछ सुनवाई ही नही होगी। (शब्द०) । (ख) कासिहु ते कला जाती मथुरा मसीद होती सुनवैया@-वि० [हिं० सुनना + वैया (प्रत्य॰)] १ सुननेवाला । २ सिवाजी न होते तो सुनति होत सव की ।-भूपण (शब्द०)। सुनानेवाला। उ०-मगल सदा ही करै राम ह्व प्रसन्न, सदा सुनना-क्रि० स० [म० श्रवण तुल० प्रा० सुनोति] १. श्रवणेंद्रिय के राम रसिकावली सुनया सुनवैया को।-रघुराज (शब्द॰) । द्वारा शब्द का ज्ञान प्राप्त करना । कानो के द्वारा उनका विपय सुनस--वि० [स०] सुदर नाकवाला। ग्रहण करना। श्रवण करना। जैसे,--फिर आवाज दो, सुनसर-संज्ञा पु० [देश॰] एक प्रकार का गहना। उन्होंने सुना नहोगा। सुनसान'--वि० [स० शून्य + स्थान] १ जहाँ कोई न हो। खाली । सयो क्रि०-पडना ।-रखना। निर्जन। जनहीन । उ०-(क) ये तेरे वनपथ परे सुनसान