पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 10.djvu/२८७

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सिंहवाहिनी' ६००७ सिहासनचक्र सिंहवाहिनी-सञ्ज्ञा स्त्री० दुर्गादेवी जिनका वाहन सिंह है। उ०--रूप सिहहतु'--सज्ञा पुं० गौतम बुद्ध के पितामह का नाम । रस एवी महादेवी देवदेवन की सिहासन बैठी सौ है सोहै सिहा-सज्ञा स्त्री० [स०] १ नाडी शाक ! करेमू । २ भटकटैया । सिंहवाहिनी ।--देव (शब्द०)। कटाई । कटकारी । ३. बृहती । बनभटा । ४ नाडी (को०) । सिहवाही-वि• पुं० [स० सिंहवाहिन् ] दे० 'सिंहवाह' । सिहा-सचा पु० १. नाग देवता। २ सिंह लग्न । ३ वह समय जव सिहविक्रम-सज्ञा पु० [स०] १ घोडा। २ सगीत मे एक ताल । तक सूर्य इस लग्न मे रहता है। ३ चद्रगुप्त नरेश का एक नाम (को०)। ४ एक विद्याधर सिहाचल-सञ्ज्ञा पुं० [स०] एक पर्वत किोला । राज (को०)। सिहाटक-सज्ञा पु० [स० शृङगाटक] चतुष्पथ । चौराहा। उ०- सिहविक्रात'---सञ्ज्ञा पु० [स० सिंहविक्रान्त] १ सिंह की चाल । और बनारस के बाहर सिंहाटक (चौराहे) पर मृगमास विकने २ अश्व | घोडा। ३ दो नगण और सात या सात से का उल्लेख है।-हिंदु० सभ्यता, पृ०, २६६ । अधिक यगणो के दडक का एक नाम । सिहाढ्य - वि० [स०] सिंहो मे सकुल या भरा हुआ [को०] । सिहविक्रात'- वि० सिंह के समान पराक्रमवाला किो०] । सिहाग-सञ्ज्ञा पु० [स०] १. नाक का मल । नकटी। रेंट । २. लोहे यो०-सिहविक्रात गति = सिंह के समान गमन करनेवाला । सिंह- का मुरचा । जग। विक्रातगामिता सिंहविक्रातगामी = दे० 'सिहविक्रातगति' । सिहविक्रातगामिता-सज्ञा स्त्री० [स० सिंहविक्रान्तगामिता] बुद्ध के सिहाएक-सज्ञा पु० [सं०] १. नाक का मल । नकटी। रेट । २ अस्सी अनुब्यजनो (छोटे लक्षणो) मे से एक । लोहे का मुरचा । जग (को॰) । सिंहविक्रोड--सज्ञा पु० [सं० सिंहविक्रीड] दडक का एक भेद जिसमे सिहान-सज्ञा पुं० [स०] दे॰ 'सिंहाण' । ६ से अधिक यगण होते है। सिंहानक-सज्ञा पु० [स० सिंहाणक] दे० 'सिंहाणक' । सिहविक्रोडित--सज्ञ' पु० [स० सिंहविक्रीडित] १ सगीत मे एक ताल । सिंहानन--सज्ञा पु० [स०। १ कृष्ण निर्गु डी । काला सँभालू । २. २ एक प्रकार की समाधि । एक बोधिसत्व का नाम । वासक । अडूसा। ४ एक छद का नाम । सिंहारहार-सज्ञा पु० [स० हार +शृङगार] दे॰ हरसिंगार (को०] । सिहविज़ भित-सज्ञा पु० [स० सिहविजृम्भित] एक प्रकार की समाधि सिंहाली-सञ्ज्ञा स्त्री॰ [स०] सिंहली पीपल । (बौद्ध)। सिहावलोक-सज्ञा पुं० [स०] एक प्रकार का वृत्त । दे० 'सिंहाव- सिहविन्ना - सज्ञा स्त्री० [स०] मापपर्णी । लोकन'-३ सिंहविष्कभित--सज्ञा पुं० [स० सिंहविष्कम्भित] एक प्रकार की सिहावलोकन-सञ्ज्ञा पुं० [सं०] १ सिंह के समान पीछे देखते हुए समाधि [को०] । आगे बढना । २ आगे बढने के पहले पिछली बातो का सक्षेप मे सिहविप्टर--सञ्ज्ञा पु० [स०] सिंहासन (को०] । कथन । ३ पद्यरचना की एक युक्ति जिसमे पिछले चरण के अत के कुछ शब्द या वाक्य लेकर अगला चरण चलता है। उ०- सिहवृता-सञ्ज्ञा स्त्री० [स० सिंहवृन्ता] वन उडटी । मापपर्णी । गाय गोरी सोहनी सुराग बाँसुरी के बीच कानन सुहाय मार सिहशाव, सिंहशावक, सिहशिशु -सज्ञा पु० [स०] सिंह का शिशु या मन को सुनायगो। नायगो री नेह डोरी मेरे गर मे फंसाय छौना [को०)। हिरदै थल बीच चाय वेलि को बँधायगो।-दीनदयाल सिहसहनन'-वि० [स०] १ सिंह के समान शक्ति या बलयुक्त । (शब्द०)। २ सु दर । सुस्प। रूपवान को०] । सिंह सनहन--सज्ञा पु० सिंह का हनन (को०] । सिहावलोकित--मज्ञा पु० [म०] दे० 'सिंहावलोकन' । सिहासन--सज्ञा पुं० [सं०] १ राजा या देवता के बैठने का प्रासन सिंहसावक-सज्ञा पु० [स०] सिंह का बच्चा। उ०—सिंहसावक या चौकी। ज्यौं तजै गृह, इद्र ग्रादि उरात ।- सूर०, ११०६ । सिंहस्कघ-वि० [स० सिंहस्कन्ध] सिंह के समान कधोवाला [को०)। विशेष-यह प्राय काठ, सोने, चांदी, पीतल आदि का बना होता है। इसके हल्यो पर सिंह का आकार बना होता है। सिहस्थ-वि० स०] १ सिंह राशि मे स्थित (बृहस्पति) । २ एक पर्व जो बृहस्पति के सिंह राशि मे होने पर होता है। २ कमल के पत्ते के आकार का बना हुया देवतानो का आसन । ३. सोलह रतिवधो के अतर्गत चौदहवाँ वध । ४ मडूर । विशेष-सिंहस्थ वृहस्पति मे विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित है । लौहकिट्ट । ५ दोनो भौहो के बीच मे वैठकी के आकार का सिहस्था-संज्ञा स्त्री० [स०] दुर्गा । चदन या रोली का तिलक । 'सिहहत्तु'-सज्ञा पु० [स०] सिंह के समान दाढ या दाढ की हड्डी जो सिहासनचक्र-सझा पुं० [स०] फलित ज्योतिप मे मनुष्य के प्राकार कि बुद्ध के वत्तीम प्रधान लक्षणो मे से एक है। का सत्ताइस कोठो का एक चक्र जिसमे नक्षत्रो के नाम भरे सिंहहत्तु-वि० जिसकी दाढ सिंह के समान हो । । रहते हैं।