पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 10.djvu/२७५

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साप्यात ५०४५ सोहन मे उत्तर को भृकता हुआ समुद्र के तट पर बमा है । यहाँ एक सासु-सा सी० [म० श्वश्रू] दे० 'माम'। उ०-प्राया मन में किला भी बना है। भर प्राकपण, उन नयनो का, मानु ने कहा ।-अनामिका, साप्यात--वि॰ [म० साक्षात् = साक्पात] दे० 'साक्षात्' । उ०- पृ० १२४ । करि स्नान दान सुचि रचि कुंपार । हाड देव रूप साप्यात चार । सासुरा-सा पु० [हिं० ससुर] १ पति या पत्नी का पिता । मगर । -पृ०, रा०, ६।१३२ । २ मसुराल। उ०-केलि कर मधुमत्त जहें धन मधुपन के सास--मज्ञा स्त्री० [स० श्वथु] पति या पत्नी की माँ । पुज । सोच न कर तुव सानुरे, सबी । सघन वनदुज । उ०-झायकि सास-मज्ञा प्रो० [म० श्वास] दे० 'सास' । -मति० ग्र०, पृ०२६० । पइठी भालि, सुदार दोठी सास विण । - ढोला०, दू० ६०४ । सासुसू-'वि० [स०] जिसम वाण हो। वाणयुक्त फिो०] । सास--वि० [स०] धनुपयुक्त । वनुप रखनेवाला [को०] । सामूय-वि० [म०] असूया युक्त । द्वेषो । ईर्ष्यालु यिो । सासए --सज्ञा पुं० [स० शासन, डि०] दे० 'शामन' । उ०- साथि-वि० [स०] अस्थियुक्त । ह्डीवाला [को०) । सिंघासण चढणं नर पासण सासण सह मानै ससार ।--रघु० सास्थिताम्रार्व-संज्ञा पु० [स०] कांसा (को०] । रू०, पृ० २२॥ सारना-यशा खो० [म०] गोमो आदि का गलकबल । सासत'-सज्ञा स्त्री० [स० शास्ति] दे० 'साँसत'। उ० - चौरासी लस सास्वत-वि० [स० शाश्वत] शाश्वत । अमर । नित्य (को०] । जिव तोहि दीन्हा । ले जीवन वड सासत कीन्हा ।—कबीर, सास्मित-सञ्ज्ञा पु० [स०] शुद्ध मत्व को विषय बनाकर की जाने- सा०, पृ० १३ । वाली भावना। सासत--वि० [स० शाश्वत] निरतर। दे० 'शाश्वत' । उ० सास्वादन-सञ्ज्ञा पु० [स०] जैन मतानुसार निर्वाण प्राप्ति की चौदह वरिण यो रहे वाडियां वागाँ वरसारणं सासतो वसत ।-वाँको० अवस्थामा मे से दूसरी अवस्था [को०] । ग्र०, भा० ३, पृ० १२२ । साह'-सज्ञा पु० [स० साधु] १ साधु । सज्जन । भला प्रादमी। सासतर--सञ्ज्ञा पु० [सं० शास्त्र] दे० 'शास्त्र'। उ०--सासतरो मे जैसे, वह चोर है और तुम बडे साह हो। उ०-बुरी वस्तु कहा है।-गोदान, पृ० १०४ । द के जिमि कोई। चोरहि साह बनावत होई । --शकुतला, सासन--सज्ञा पु० [स० शासन] दे० 'शामन' । उ०--पुत्र श्री पृ० ६२ । २ व्यापारी । साहूकार । ३ धनी । महाजन । सेठ । दशरत्य के वनराज सासन पाइयो।-केशव (शब्द॰) । ४ लकडी या पत्थर का वह लबा टुकडा जो दरवाजे के चौखटे मे देहलीज के ऊपर दोनो पाश्वों मे लगा रहता है । सासनलेट-सञ्चा पु० [?] एक प्रकार का सफेद जालीदार कपडा। मुहा०-साहखर्ची = फिजूलखर्ची । अनावश्यक खर्च। शान सासना--सञ्ज्ञा स्त्री॰ [म० शासन] १ दे० 'शासन' । उ०--सासना शौकन के लिये धन का अपव्यय । उ० -पुराने ढरे की न मानई जो काटि जन्म नर्क जाय ।--केशव (शब्द॰) । साहखर्ची और पास पडोस के लोगो से यश पाने को भूख-इन २ कष्ट । वास । दु ख । पोडा। उ.--बहु सासना दई दोनो लतो न खापा पडित का तबाह कर रखा था । पहलाद, तऊ निसक लियो ।--पोहार अभि० ग्र०, पृ० २४० । -नई०, पृ०४। सापर बाड़ो--Hशा सा [ म० श्वयू, ब०, हिं० सासर + वाडी] साह-सा पु० [फा० शाह] स्वामी। ससुराल। उ०--करहा देस सुहामएँउ जे मू सासर वाडि । द० 'शाह'। उ.-प्रनि गाँव सरोखउ पाक गिणि जाति करीरी झाडि। -ढोला०, ही अयाने उपखानो नहि बूझ लाग, साह हो को गोत गोत होत है गुलाम को । -तुलसी २०, पृ० २२० । दू० ४३२ । साह-वि० [स०] १ जो साहम और मफलतापूर्वक प्रतिरोध करे। सासरा--Hशा पुं० [स० श्वथू + आलय] दे० 'ससुराल' । २ निरोध या दमन करनेवाला [को०] । सासाहे--वि० [सं०] १ सहन करने योग्य । सह्य। २ जोतने या साहचर्य-ज्ञा पु० [सं०] १. सहवर होन का विध्वस करनवाला (को०) । भाव । साथ रहने का भाव । सहचरता। २ सग । नाथ । सासाहु-सञ्ज्ञा स्त्री॰ [स० सशय, पु० हिं० समा (कबीर)] सदेह । साहजिक-वि० [सं०] सहज । नैसगिक । स्वाभाविक (को०] । शक । उ०पाई वतावन हो तुम्है राधिके लोजिए जानि न साहजिकवर्म-शा पु० [स०] शुक्रनीति के अनुसार पारितोपिक । कीजिए सासा ।-रसकुसुमाकर (शब्द०)। वेतन, विजय आदि मे मिला हुआ धन । सासा'-तशा पुं० [सं० श्वास] दे० 'श्वास' या 'सांस' । साहणहार-वि० [हिं० सहना + हार (प्रत्य॰)] झेननेवाला। सासार-वि० [सं०] १ आसार युक्त। मूसलाधार वृष्टि से युक्त । सहनेवाला । सहन करनवाला। उ०--ज्यू ज्यू हरि गुण २ वरसाती (को०)। सांभली त्यूं त्यूँ लाग तौर। लागै ये भागा नही माणहार सासि--वि० [स०] प्रसि या कृपाणयुक्त (को०] । कवीर ।--कबीर ग्र०, पृ०६४ । सा--वि० [सं०] असु या प्राणयुका । जोवित । साहन-सचा पु० [सं०] सहन शक्ति । सहनशीलता (फो०।