पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२४

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ओखलडांगा-ओखामण्डल ४८३ भोखलडांगा-युक्तप्रदेशके कुमायूं जिलेका एक ग्राम। जहाजोंको ख ब सचेत रहना पड़ता है। यहां बाहाख यह अक्षा०२८°१४ २०"उ०, तथा देशा० ७.३८और सोहाने महाजन हैं। पहले यहांके लोग काब, पू०पर मुरादाबाद और पलमोड़ेके मध्यवर्ती पथमें मोद और काल तीन श्रेणीमें विभक्त थे। किन्तु काब कोशीला नदी किनारे अवस्थित है। इस स्थानमें | और मोद अब देख नहीं पड़ते। काल जातिसे वर्तमान अति उत्कृष्ट चावल होता है। वाघेरोंकी उत्पत्ति है। पहले श्रीक्वष्णने यहां अपना अोखलौ (हिं० स्त्री०) उदूखल, कांडी। यह काष्ठ राज्य स्थापित किया था। किन्तु पोखामण्डलके भाट वा प्रस्तरको होती है। इसमें धान्य को छोड़ और वर्णन करते हैं-ई० श्य शताब्दके मध्य काल मूसलसे कूट मूसी निकालते हैं। हिन्दु स्थानमें प्रायः लोगोंने इसे फिर जीत लिया। सिरीयाके वीर सुक्क र भूमिको खोद और पत्थर जोड़ पोखली बना लेते हैं। बेलिमने भी धोखामण्डल अधिकार किया था। किन्तु पोखा (हिं० पु.) १ व्याज, बहाना। (वि.) हारकाके समुद्रमें डब जानेसे वह अपनी राजधानी २ शुष्क, सूखा। ३ कुटिल, टेढ़ा, खराब। ४ दृषित, गोरिंजाको उठा ले गये। पोछे सिरीयाके दूसरे वार खोटा। ५ विरल, जो गाढ़ा न हो। मेहेम-गुटुकने सुक्कुर बेलिमको मार अपना राज्य पोखामण्डल-काठियावाड़ प्रान्तका एक छोटा जिला। जमाया। अन्तको काल लोगोंने फिर पोखामण्डल यह अक्षा० २२ एवं २२.२८ उ. और देशा०६८. जीता था। ई० ६ष्ठ शताब्दके समय काठियावाड़के ५८ तथा ६८.१२ पू०के मध्य अवस्थित है। ओखा चाबढ़ राजपूतोंने अाक्रमण किया और कालों या मण्डलसे उत्तर कच्छकी खाडी, पश्चिम परब-समुद्र वाघेरोंको यहांसे निकाल दिया। अचयराज राजा और पूर्व तथा दक्षिण रान या नाना दलदल पड़ता, बने थे। फिर उनके पुत्र भूवड़राय और भूवड़ायके जो इसे नवानगर जिलेसे पृथक करता है। असलमें पुत्र जयसेन सिंहासनारूढ़ हुये। जयसेनने ही चावढ़ा- यह एक होप है। क्षेत्रफल २५० वर्गमौल है। कहीं पादर नगर बसाया और एक बड़ा तालाब बनाया कहीं पहाड़ी देख पड़ती है। थूहरका जंगल बहुत था। मूलवासर झोलमें उनके समयका एक पत्थर है। यहां गोमती नदी छोटी है। भौमगन झोलसे मिला है। जयसेनका उत्तराधिकार उनके भाई जग- एक पहाड़ी नाला भी निकला है। बरवाला, बरदिया देवने पाया। जगदेवके पुत्र मङ्गलजी अपने पिताके और पोसितरामें रेतीला पत्थर बहुत होता, जो मकान मृत्य होने बाद कुछ वर्ष जी कर मर गये। उनके बनाने में काम देता है। मूलवासर, मूलवेल और लड़के देवलदेव फिर राजा बने । देवलदेवके बाद सामलासरमें बड़े-बड़े तालाब हैं। घर-घर और उनके लड़के जगदेव सिंहासनपर बैठे, जिनके कनक- खेत-खेत कूवें बने हैं। पानी प्रायः खारी है। समुद्र सेन और अनन्तदेव दो पुत्र रहे। कनकसेनने हो । के किनारे कुछ नहीं उपजता। किन्तु भीतरी भूमि कनकपुरो' बसाई, जो पौछ 'वसाई' कहाई । प्राचीन . उर्वरा है। दक्षिणांशको अपेक्षा उत्तरांशमें दूनी चौज कालपर यह पुरी पोखामण्डलके व्यवसायका केन्द्र- होती है। वनका प्रभाव है। कहीं कहीं बबूल और स्थल थी। वर्तमान समय केवल एक ग्राम रह गया इमलीके वृक्ष लगे हैं। बम्बई, सूरत, कराची और है। - कनकसेनके बनाये बड़े-बड़े जैन-मन्दिर टूटे- जंजीबारके साथ व्यवसाय होता है। बाजरी, तिल, फटे पड़े हैं। अनन्तदेव हारकामें राज्य करते थे। घी, घास, चूना और नमक बाहर भेज जाता है। उनके अयोग्य होनेसे. परमार या हेरोल राजपूतोंने चावल, चना, गेहूं, ज्वार, कपासका वीज, चीनी, अपना अधिकार जमा लिया। किन्तु चावढ़ों पोर .-मसाला, बाल और कपड़ा बाहरसे आता है। रूपन उनमें युद्ध होने लगा। इधर रावलजी और और बैयत बंदर हैं। रूपन हारकासे १ मोल उत्तर वीजलजी दो राठौर राजपूत जोधपुरसे निकाल दिये पड़ता है। खाड़ीमें पानीके भीतर छिपे पहाड़ हैं।। गये थे। वह कितनी ही फौजके साथ हारका आये।