पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

उदयचन्द्र-उदयनाचार्य एक अनुशासन मिला है। वेशनगर निकटस्थ रहा- । उदयत् (स. त्रि०) अर्ध्वगामी, ऊपर चढ़नेवाला, दिके प्राचीर इसी पर्वतके प्रस्तरसे बने हैं। जो निकल रहा हो।

मन्द्राज प्रदेश के अन्तर्गत गजाम जिलेका एक | उदयन (स.पु.)९ अगस्त्य । २ शतानीकके पुत्र।

ताल्लक। इसमें खन्द और शबर जातिके लोक अधिक पत्नीका वासवदत्ता और पुत्रका नाम नरवाहन था। (नृसिहपुराख २३१२) मतान्तरसे यह शतानीकके पौत्र . . .४ मन्द्राज प्रान्तके अन्तर्गत नेल्ल र जिलेकी एक रहे। अपर पत्नीका नाम रत्नावली था। कौशाम्बी तहसौल। भूमिका परिमाण ८५० वर्गमील है। नगरी इनको राजधानी थी। कोई कोई बुद्धदेवको लोकसंख्या प्रायः एक लक्षसे कम है। इनका धर्मशिक्षक बताते है। ३ वषभराज। ४ वत्स- उदयचन्द्र-१ बम्बईप्रान्तीय कनाड़ा जिलेवाले प्राचीन राज। कथासरित्सागरमें इनका उपाख्यान आया पल्लव-नृपति नन्दीवमाके एक सेनापति । ये है। ५ शुद्धोदनके एक पुरोहित। (लो०) भाके पुचानवंश-सम्म त और वेगवती नदीतीरस्थ विल्वल- | ल्य ट्। ६ उत्थान, निकास, उठान। ७ फल, नतीजा। नगरके अधिपति थे। मन्द्राजप्रान्तीय उत्तर-अरकाट ८अन्त, अखीर। जिलेके प्राचीन नरेश उदयेन्दिरमका जो तामफलक | उदयनाथ त्रिवेदी कवीन्द्र-ट्वाबके अन्तर्गत अमेठोके निकला, उसमें लिखा है-श्य परमेश्वरवा-नृपतिके एक प्रधान कवि। प्रथम ये अमेठोके राजा हिमत. अनुयायो द्रामिल राजावोंने नन्दीपुरमें नन्दोवाको सिंहको सभामें रह कविता बनाते थे। इनका विर- घेर लिया था। किन्तु उदयचन्द्र ने वहां पहुंच अपने चित 'रसचन्द्रोदय' वा 'रतिविनोद' नामक हिन्दी ग्रन्थ हाथसे पल्लवराज चित्रमयको मारा और स्वामीको पढ़ राजा अतिशय सन्तुष्ट हुये। उन्होंने उदयनाथको कष्टसे उबारा। इन्होंने निम्बवन, च तवन, शङ्करग्राम, 'कवीन्द्र' उपाधि दिया था। उक्त पुस्तक १८०४ नेल्लूर, नेलवेली,. सुरावलन्दूर तथा अन्य स्थानों के भी विक्रमाब्दमें लिखा गया। पीछे इन्होंने अमेठीके गुरु- रणक्षेत्रमें कई बार शत्र को हराया और नन्दीवाका दत्तसिंह एवं भगवन्तराय खोची, अजमेरके गजसिंह राज्य बचाया था। नेलवेलीमें उदयचन्द्र ने शबरराज और बूदीके बुद्धराय प्रभृति राजाको सभामें महा उदयनको भी वधकर मोरपुच्छ लगा शीशेका छत्र सम्मान पाया था। इनके पुत्र का नाम दूलह त्रिवेदी छीन लिया । उत्तरीय प्रान्तमें इन्होंने अश्वमेधयज्ञ था। वे भी एक अच्छे कवि थे। उनका रचा 'कवि- करनेवाले पृथिवीव्याघ्र नृपतिके सेनापति निषादको कुल-कण्ठाभरण' नामक हिन्दीग्रन्थ युक्त-प्रदेश में विष्णुराजके राज्यसे भगाया और नन्दीवमीको उसका समादृत है। अधिपति बनाया था। मणाईकडो में , उदयचन्दने उदयनाचार्य (स.पु.) कुसुमाञ्जलि नामक कालीदुर्ग नामक किला तोड़ पाण्डयोंका सैन्य हराया। दर्शनग्रन्थ प्रणेता। भक्ति-माहामा ग्रन्थके मतसे- नन्दीवाने अपने राज्यके २१ वें वर्षमें इनके कहनसे "भगवानपि तव व मिथिलायां जनादं नः । १०८ ब्राह्मणोंको वेलातूरका कुमारमङ्गल नामक ग्राम श्रीमदुयनाचार्यरूपेण्णावततारह ॥" (२०२३) उत्सर्ग किया और उसका नाम बदल कर उदयचन्द्र- "चौद्धसिद्धान्तमुग्धान्तमुखाय हितकारिणीम् । मङ्गल रख दिया। आज उसे उदयेन्दिरम् कहते हैं। व्यतेने विदुषां प्रौत्य विमलां किरणावलीम् ॥” (३१॥३) : .:.२ बम्बई प्रान्तस्थ गुजरातवाले प्राचीन चालक्य “अद्यापि मिथिलायान्तु तदन्वयभवा हिजाः। नृपति (११४३ से ११७४) कुमारपालको सभाके विद्वांसः शास्त्रसन्पन्ना: पाठयन्ति ग्रह यह ” ( ३१॥८१). एक जैन पण्डित । पाटनमें भद्रकाली मन्दिरके अर्थात् भगवान् जनार्दन मिथिलापर उदयनाचा- निकट जो शिलालिपि निकली, उसमें यह बात | यक रूपमें उतरे हैं। उन्होंने बौद्ध सिद्धान्तमुग्ध लिखी है। . लोगोंके सुखविधान और पण्डित-मण्डलीके प्रीति-