पृष्ठ:हिंदी रस गंगाधर.djvu/४

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निवेदन

पुञ्जीभूतिः सुबहुजनिभिः श्रेयसां संचितानाम्
साक्षाद्भाग्यं ननु निवसतां नन्दपल्लीषु पुंसाम्।
पात्रं प्रेम्णां ब्रजनववधूमानसादुद्गतानाम्
आम्नायानां किमपि हृदयं स्मर्यतां मञ्जुमूर्ति॥

उद्देश्य और परिस्थिति

जिस समय मैं श्रोनाथद्वार की संस्कृत पाठशाला मे अध्यापक था, उस समय मेरे एक मित्र वैद्य श्रीकृष्ण शर्मा हिंदी साहित्य सम्मेलन की मध्यमा परीक्षा दे रहे थे। वे कभी कभी मेरे पास भी रसों और अलंकारों का विषय समझने के लिये आ जाया करते थे। मुझे उस समय अनुभव हुआ कि हिंदी भाषा में रसों और भावों के विषय को प्राचीन शैली से यथार्थ रूप में समझा देनेवाला कोई भी ग्रंथ नही है। उन्होंने मुझसे आग्रह भी किया था कि आप इस विषय में कुछ लिखिए; पर अवसराभाव से उस समय कुछ भी न हो सका। अस्तु।

उस बात को आज कोई चार-पाँच वर्ष हो गए। विक्रम संवत् १९८२ के माघ मास में मैंने किसी विशेष कारण-वश श्रीनाथद्वार छोड़ दिया। उसके कुछ ही दिनों बाद—चैत्र में—बंबई निवासी गोस्वामिकुलकौस्तुभ श्रीगोकुलनाथजी महाराज