पृष्ठ:हिंदी रस गंगाधर.djvu/२६४

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दन से ये वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। तात्पर्य यह है कि माधुर्यगुण से युक्त रस का आस्वादन करने से चित्त पिचल जाता है, ओज-गुण से युक्त रस के प्रास्वादन से चित्त में जोश आता है और प्रसाद-गुण से युक्त रस के प्रास्वादन से चित्त विकसित हो जाता है-खिल उठता है। इस तरह इन गुणों के केवल रस-धर्म (उन्हीं मे रहनेवाले) सिद्ध होने पर, लोगों का जो (पद्य की) रचना मधुर है' 'बंध ओजस्वी है' इत्यादि कथन है, वह कल्पित है, जैसे कि किसी मनुष्य के विषय मे कहा जाय कि-'इसका आकार शूर-वीर है। तात्पर्य यह कि शुर-वीर होना मनुष्य के प्रात्मा का धर्म है, उसके आकार का नही, क्योंकि आकार तो जड़ है, सो जिस प्रकार यह कथन कल्पित है, उसी प्रकार पूर्वोक्त व्यवहारों को भी समझिए। यह है मम्मट-भट्ट आदि-प्राचीन विद्वानों का मत।

पर पण्डित-राज के विचार मित्र हैं। वे कहते हैं कि-इन माधुर्य, ओज और प्रसाद गुणों को जो केवल 'रस के धर्म' ही बताया जाता है यह माना जाता है कि ये केवल रस ही मे रहते हैं-इसमें क्या प्रमाण है? आप कहेंगे कि-प्रत्यक्ष ही है; क्योंकि पूर्वोक्त रीति के अनुसार हमे उन-उन रसों के आस्वादन से पूर्वोक्त चित्रवृत्तियों की उत्पचि का अनुभव होता है; तो हम कहेंगे कि नहीं। जैसे अग्नि का कार्य दग्ध करना है और उष्ण स्पर्श उसका गुण है, इन दोनों का हमें पृथक्-पृथक् अनुभव होता है-हम जलते नही, पर हमे उष्ण