पृष्ठ:हिंदी रस गंगाधर.djvu/१५५

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तब तुमने जो इसे "ध्वनि-काव्य" माना है सो न हो सकेगा। इस तरह युक्ति के द्वारा भी तुम्हारा सब आडंबर व्यर्थ ही सिद्ध होता है। सो अत्यंत चतुर नायिका के कहे हुए इन विशेषणो का वाच्य अर्थ (वापीस्नान) और व्यंग्य अर्थ (संभोग) दोनों में साधारण होना-दोनों में बराबर लग जाना—ही उचित है, न कि एक (संभोग) ही मे लगना।

तब उनको यो लगाना चाहिए—"हे बांधव जन के (मेरे) ऊपर आई हुई पीड़ा को न जाननेवाली स्वार्थ मे तत्पर दूती। तू स्नान का समय न चूक जाय इसलिये, नदी और मेरे प्रिय दोनों के पास न जाकर, मेरे पास से स्नान करने के लिये सीधी बावड़ी चली गई, उस, दूसरे की पीड़ा को (जानते हुए भी) न जानकर दुःख देनेवाले, अतएव अधम के पास नही। यह तेरी दशा से सूचित होता है। देख, बावडी मे बहुतेरे युवा लोग नहाने के लिये आया करते है, उनसे लज्जित होने के कारण, तूने अपने हाथों को कंधे पर धरकर और उनमे ऑटी लगाकर स्तनों को मला है; अतः ऊँचा होने के कारण स्तनो का ऊपरी भाग ही मला जा सका और छाती का चंदन लगा ही रह गया। इसी तरह, जल्दी मे, अच्छी तरह न धोने के कारण ऊपर के होठ का रंग पूरा न उड़ सका, पर नीचे के होठ मे कुल्लो के जल, दॉत साफ करने की अंगुली आदि की रगड़ अधिक लगती है, इस कारण वह बिलकुल साफ हो गया। नेत्रो मे जल केवल लग ही पाया, अतः ऊपर ऊपर