पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/६६४

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पहला नाटक 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' ऐसा ही था। उसमें उन्हों ने समाज में प्रचलित बहुत सी दूषित बातों की ओर पाठकों और दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है। वास्तव में भारतेन्दु की देशानुराग परायण बुद्धि ने उन सूक्ष्म जीवन-संचारक तत्वों को अच्छी तरह समझ लिया था जो हिन्दू समाज के पुनरुज्जीवन केलिये आवश्यक थे।उन्हों ने 'कर्पूरमञ्जरी', 'सत्य हरिश्चन्द', 'चन्द्रावली नाटिका', 'भारतदुर्दशा', 'अन्धेर नगरो', 'नोलदेवी' आदि नाटकों की रचना इसी उद्देश्य से की कि हिन्दू समाज के आरोग्य लाभ केलिये वे उन्हीं तत्वों को उपस्थित करें। इसमें तो वे सफल हुये ही, साथ ही नाटक-रचना के कार्य में अग्रणी होने के कारण हिन्दी का प्रथम नाटककार होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त हुआ। भारतेन्दु की भाषा के जो दो नमूने ऊपर दिये गये हैं उनमें से नम्बर

१ को देखने से आप को यह भी ज्ञात हो जायगा कि भारतेन्दू जी ने मुहावरे दार भाषा का उद्योग भी किया था। 'नाम बिकना','मारे मारे फिरना' आदि मुहावरे हैं जिनके व्यवहार ने भाषा की मरसता को बढ़ा दिया है। अवतरण नम्बर २ में इस प्रकार के मुहावरों का अभाव है इसका कारण भी स्पष्ट है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के बहु-संख्यक प्रयोगों ने मुहावरों के प्रवेश में रुकावट डाल दी है. प्रायः मुहावरों को छटा बोलचाल की भाषा में ही दृष्टिगत होती है।
समय के प्रभाव से उस समय बाबू हरिश्चन्द्र को अनेक सहयोगी भी प्राप्त हुये, उनमें से कुछ प्रमुग्व का वर्णन नीचे किया जाता है।
कानपूर के पं० प्रताप नारायण मिश्र विलक्षण प्रतिभा के मनुष्य थे. देश प्रेम उनमें कूट कूट कर भरा था वे खरे थे, इसलिये खरी बातें भी कहते थे।स्वतन्त्र प्रकृति के थे, इसलिये उनकी सभी बातों में स्वतंत्रता दिखाई पड़ती है। उनकी भाषा में भी स्वतंत्रता का रङ्ग अधिक है। वे लिखते हैं.सामयिक हिन्दी. परन्तु उसमें मनमानापन भी मौजूद है। वे फ़ारसी. संस्कृत और उर्दू के अच्छे जानकार थे। फिर भी