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उन्नति-काल।

विस्तार-काल के लेखकों ने हिन्दी-गद्य का क्षेत्र विस्तृत तो किया, किन्तु भाषा के सम्बंध में वे कोई निश्चित आदर्श उपस्थित न कर सके मुंशी सदासुख लाल, लल्लू जी लाल पं° सदल मिश्र, सय्यद इंशा अल्ला खां आदि लेखकों ने भिन्न भिन्न प्रकार की भाषा लिखी। प्रथम तीनों की भाषा में व्रजभाषा का यथेष्ट पुट था। अतएव वह खड़ी बोली के प्रारम्भिक काल की सूचक हो हो कर रह गयी। रही इंशा अल्ला खां की भाषा, वह उनकी व्यक्तिगत रुचि से बहुत अधिक प्रभावित है। उनकी प्रकृति के अनुरूप उसमें विलासविभ्रममयी कामिनी के समान चटक मटक अधिक है, वह अधिकतर ऐसी है कि कहानी किस्सों ही में काम दे सकती है, अन्य विषयों में नहीं। पादरी साहब को भाषा का प्रचार परिमित क्षेत्र ही था। अतएव यह स्पष्ट है कि गद्य परिधि के विस्तार ने भाषा का स्वरूप निश्चित कर के उसे सर्वोपयोगी, तथा सब प्रकार के विचारों को प्रगट करने के योग्य बनाने की समस्या उन्नति काल के लेखकों के सामने उपस्थित की।।

अनेक श्रेणियों के लेखकों की प्रतिभा के संघर्ष से यह समस्या इसी काल में हल हुई। निवन्ध, नाटक, उपन्यास और समालोचना आदि के क्षेत्रों में प्रचुर व्यवहृत होने से इसी समय गद्य की एक सुन्दर शैली का विकास में आकर समुन्नत होना स्वाभाविक था। उन्नति क्रम क्या था, मैं अब यह दिखलाऊँगा।

राजा शिवप्रसाद उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुये। उन्हीं के समय से हमने हिन्दी-गद्य का उन्नति-काल माना है। सन् १८५४ में सर चार्ल्स उड ने देशी भाषाओं में ग्रामवासियों के शिक्षा देनेकी जो योजना बना कर भेजी थी उसमें हिन्दी को स्थान ही न मिलता, यदि राजा साहब ने अपार परिश्रम करके हिन्दी में कुछ पाठ्य पुस्तकें तैयार न की होतीं। यदि शिक्षा योजना में हिन्दी को स्थान न मिलता, तो उस समय न तो उसका उन्नति पथ प्रशस्त होता, और न वह जैसा चाहिये वैसा