पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/६३१

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हो हिन्दी में पुस्तकों की रचना होने लगी थी। किन्तु ये पुस्तकें पद्य ही में लिखी जाती थीं। हिन्दी बोलचाल की भाषा थी, किंतु उस बोलचाल का ऐसे गम्भीर अथवा उपयोगी विषयों से सम्बन्ध नहीं था कि वह लिपिवद्ध कर ली जावे। धार्मिक आन्दोलनों का भी सम्बन्ध अधिकतर जनता से नहीं रहता था। हिन्दू आचार्यों ने भी उस समय इस बात का प्रयत्न नहीं किया कि जनसाधारण के लिये धार्मिक सिद्धांत सुलभ हो जाँय। राजनीतिक हलचल होने पर भी समाचारों के प्रचार का कोई साधन न होने के कारण इस दिशा में भी गद्य की प्रगति असम्भव थी। शासन-पद्धति एकाधिपत्य मूलक होने के कारण जहाँ कहीं हिन्दी भाषी नरेशों के राज्य थे वहाँ भी अनेक व्यक्तियों, अथवा व्यक्ति-समूहों के वाद-विवाद का कोई अवसर नहीं था। ऐसी परिस्थिति में हमें हिन्दी गद्य का आदिम स्वरूप यदि उन थोड़े से परवानों के रूप में मिलता है जो हिन्दू नरेशों ने‌ अपने कृपा पात्रों के लिये जारी किये तो आश्चर्य ही क्या? रावल समर सिंह और महाराज पृथ्वीराज के ऐसे नौ दान पत्र अबतक उपलब्ध हो सके हैं। उनमें से दो मैं नीचे लिखता हूँ। आप उनकी भाषा पर दृष्टिपात करें:—

१—स्वस्ति श्री श्री चीत्रकोट महाराजाधीराज तपे राज श्री श्री रावल जी श्री समरसो जो बचनातु दा अमा आचारज ठाकर रुसीकेप कस्य थाने दलोसु डायजे लाया अणी राज में ओपद थारी लेवेगा, ओपढ़ ऊपरे माल की थाकी है ओजनाना में थारा वंसरा टाल ओ दुजो जावेगा नहीं और थारी बैठक दली में हो जी प्रमाणे परधान बरोबर कारण देवेंगा ओर थारा वंस क सपूत कपून वेगा जो ने गाय गोणों अणी ग़ज में खाप्या पाप्या जायेगा ओर थाग चाकर घोड़ा को नामो कोठार सुँ चला जायेगा ओर थूं जमाखातरी रीजो मोई में राज थान बाद जो अगी परवाना रो कोई उलंगण करेगा जी ने श्री एक लींग जो की आण हे दुवे पंचोली जानकी दास सं॰ १९३९ काती बढ़ी ३"

२—"श्री श्री दलीन महाराजं धीराजंनं हिन्दुस्थानं राजंधानं संभरी नरेस पुरबदली तषत श्री श्री माहानं राजंधीराजंनं श्री पृथीराजी सु साधंनं