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जी के सम्बन्ध में निम्नलिखित कवित्त लिखा है:-

सूर सूर तुलसी सुधाकर नच्छत्र केसौ,
सेस कविराजन कौ जुगुनू गनाय कै। .
कोऊ परिपूरन भगति दिखरायो अब,
काव्यरीति मोसन सुनहु चित लाय कै।
देव नभ मंडल समान है कबीन मध्य,
जामैं भानु सितभानु तारागन आय कै।
उदै होत अथवत चारों ओर भ्रमत पै,
जाको ओर छोर नहिं परत लखाय कै।

इससे अधिक लोग सहमत नहीं हैं, इस पद्म ने कुछ काल तक हिन्दी संसार में एक अवांछित आंदोलन खड़ा कर दिया था । कोई कोई इस रचना को अधिक रंजित समझते हैं ! परन्तु मैं इसको विवाद-योग्य नहीं समझता। प्रत्येक मनुष्य अपने विचार के लिये स्वतंत्र है। जिसने इस कवित्त की रचना को उसका विचार देव जी के विषय मे ऐसा ही था। यदि अपने भाव को उसने प्रगट किया तो उसको ऐसा करने का अधिकार था। चाहे कुछ लोग उसको वक्रदृष्टि से देखें. परन्तु मेरा विचार है कि यह कवित्त केवल इतना हो प्रगट करता है कि देव जी के विषय में हिन्दी संसार के किसो किसी विदग्ध जन का क्या विचार है । मैं इस कवित्त के भाव को इसी कोटि में ग्रहण करता हूं और उससे यही परिणाम निकालता हूं कि देव जी हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में एक विशेष स्थान के अधिकारी हैं। कोई भाषा समुन्नत होकर कितनी प्रौढ़ता प्राप्त करती है देव जी की भाषा इसका प्रमाण है। उनका कथन है:-

   कविता कामिनि सुखद पद सुबरन सरस सुजाति
   अलंकार पहिरे बिसद् अद्भुत रूप लखाति।

में देखता हूं कि उनकी रचना में उनके इस कथन का पूर्ण विकास है जितनी बातें इस दोह में हैं वे सब उनकी कविता में पायी जाती है।