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मुसुकात जबै दसनावलि देखि
लजात तबै तब कुन्द कली।
अति चंचल नैनफिरै चहुघां नित
पोखत लाल है भांति भली।
तिन के पद पंकज को मकरंद

सुनित्य लहै हरिबंस अली।

हरिवंस अली


जैसे गुरु तैसे गोपाल।
हरि तौ तबहीं मिलिहैं जबहीं श्रीगुरु होयँ कृपाल।
गुरु रूठे गोपाल रूठि हैं वृथा जात है काल।

एक पिता बिन गनिका सुत को कौन करे प्रतिपाल।

व्यासजी


सजनी नवल कुंज बन फूले।
अलिकुल संकुल करत कुलाहल सौरभ मनमथ मूले।
हरखि हिंडोरे रसिक रास बर जुगुल परस्पर झूले।
विट्ठल बिपुल बिनोद देखि नभ देव विमानन भूले।

यह बिट्ठल विपुल जी का पद्य है। स्वामी हरिदास जी के आप शिष्य थे, उनका स्वर्गारोहण होने पर आप ही उनकी गद्दी पर बैठे । गुरु के चरणों में आप का इतना अनुराग था कि उनके शरीर का पात होने पर उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। एक रास के समय कहा जाता है कि स्वयं श्रीकृष्णजी ने उनकी आँखों की पट्टी खोली। एक बार रास में आप इतने प्रेमोन्मत्त हुये कि तत्काल देहान्त हो गया।

बने बन ललित त्रिभंग बिहारी।
बंसीधुनि मनु बंसी लाई आई गोपकुमारी।