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मेरठ के आस पास जो बोली उस समय बोली जाती थी उसी पर दृष्टि रखकर उन्होंने अपनी रचनायें कीं। इसीलिये वे अधिकतर बोलचाल की भाषा के अनुकूल हैं और इसी से उनमें विशेष सफ़ाई आ गई है। उनकी कविता में ब्रजभाषा के कुछ शब्दों और क्रियाओं का प्रयोग भी पाया जाता है। जैसे बढ़ावनहारा, वासे, बनायो, वाको, पूछयो, दुराय, बनाय, बतियां इत्यादि। मैं समझता हूं कि इन शब्दों का व्यवहार आकस्मिक है और इस कारण हो गया है कि उस समय ब्रज-भाषा फैल चली थी और उसकी मधुरता कवि हृदय को अपनी ओर खींचने लगी थी॥



अमीर खुसरो का समकालीन एक और मुल्लादाऊद नामक ब्रजभाषा का कवि हुआ। कहा जाता है कि उसने नूरक एवं चन्दा की प्रेम-कथा नामक दो हिन्दी पद्य-ग्रन्थों की रचना की, किन्तु ये दोनों ग्रन्थ अप्राप्त से हैं। इस लिए इसकी रचना को भाषा के विषय में कुछ लिखना असम्भव है। इसके उपरान्त महात्मा गोरखनाथ का हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में दर्शन होता है। हाल में कुछ लोगों ने इसको ग्यारहवीँ ई॰ शताब्दी का कवि लिखा है, किन्तु अधिकांश सहमति यही है कि ये चौदहवीं शताब्दी में थे। ये धर्म्माचार्य्य ही नहीं थे, बहुत बड़े साहित्यिक पुरुष भी थे। इन्होंने सँस्कृत भाषा में नौ ग्रंथों की रचना की है, जिनमें से 'विवेक-मार्तण्ड', 'योग-चिन्तामणि' आदि प्रकाण्ड ग्रन्थ हैं। इनका आविर्भाव नेपाल अथवा उसकी तराई में हुआ। उन दिनों इन स्थानों में विकृत बौद्ध धर्म का प्रचार था, जो उस समय नाना कुत्सित विचारों का आधार बन गया था। इन बातों को देख कर उन्होंने उसका निराकरण करके आर्य्यधर्म्म के उत्थान में बहुत बड़ा कार्य किया। उन्होंने अपने सिद्धान्त के अनुसार शैव धर्म का प्रचार किया, किन्तु परिमार्जित रूप में। उस समय इनका धर्म इतना आद्रित हुआ कि उनकी पूजा देवतों के समान होने लगी। इनका मंदिर गोरखपुर में अब तक मौजूद है गोरख पंथ के प्रवर्तक आप ही हैं। इनके अनुयायी अब तक उत्तर भारत में जहां तहां पाये जाते हैं। इनकी रचनाओं एवं शब्दों का मर्म समझने के लिये यह आवश्यक है कि उस काल के बौद्ध धर्म की अवस्था आप लोगों के सामने