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दूसरा अध्याय।


हैं उनको भी लोक बहुधा साफ साफ कबूल कर लेते हैं। परन्तु इस देश में जिन बातों के लिए कानून का बिलकुल डर नहीं, डर सिर्फ सामाजिक कलंक का है, उनको कबूल करने में भी लोग आगापीछा करते हैं जो लोग खुशहाल हैं, जो अपने घर के अच्छे हैं, जिनके निर्वाह का साधन समाज की राय पर अवलम्बित नहीं है-अर्थात् जिनको समाज की परवा नहीं है-उनको छोड़कर और लोग कानून से जितना डरते हैं उतना ही वे लोक-लजा से डरते हैं। आदमियों के रोटीकपड़े का मार्ग बन्द कर देना उनको जेल में भेज देने के बराबर है। इस लिए आदमी दोनों से बराबर डरते हैं। अपने निर्वाह के लिए जिन लोगों ने काफी सम्पत्ति इकठा करली है काफी रुपया पैदा कर लिया है-अतएव जिनको सरकारी अफसरों की, सभा-समाजों की और सर्व-साधारण की कृपा या मदद की परवा नहीं है वे अपने विचार लब के सामने जाहिर करते नहीं डरते। उनकी जो राय, भली या बुरी, होती है उसे-वे निडर होकर साफ साफ कह डालते हैं। यदि उन्हें कुछ डर लगता है तो इतना ही कि लोग हमारी निन्दा करेंगे और दो चार भली-बुरी सुनावेंगे। इससे अधिक नहीं। इन बातों को वे सह लेते हैं। और इनके सहन करने के लिए बड़ी वीरता या बड़े साहस की जरूरत भी नहीं है। इससे ऐसे आदमियों के लिए कोई चिन्ता की बात नहीं। परन्तु जिनके खयालात हमारे खयालात से नहीं मिलते-जिनकी राय हमारी राय के खिलाफ है अर्थात् जो विरुद्धमतवादी हैं-उनको यद्यपि, इस समय, हम लोग पहले की तरह तंग नहीं करते, तथापि उनके साथ हम जैसा बर्ताव करते हैं उससे हमारी हानि होने की सम्भावना जरूर है। इसमें कोई सन्देह नहीं। साक्रेटिस जरूर मार डाला गया; परंतु उसके तत्त्वशास्त्र का प्रचार इस तरह बढ़ता गया जिस तरह कि सूर्य का विम्ब क्रम से आकाश में आगे को बढ़ता जाता है। यही नहीं, किन्तु धीरे धीरे उस तत्त्वविद्या का प्रकाश सारे ज्ञानाकाश में व्याप्त हो गया। क्रिश्चियन धर्म के अभिमानी खूख्वार शेरोंका शिकार बना दिये गये। परंतु क्रिश्चियन-धर्मरूपी वृक्ष दिनबदिन विशाल और ऊंचा होता गया; और धीरे धीरे अन्य-धर्मरूपी छोटे छोटे पेड़ों को उसने अपनी छाया के नीचे कर लिया; अतएव उनकी बाढ़ बंद हो गई। जो बातें हमको पसन्द नहीं उनको हम नहीं सहन करते; अतएव उनके प्रचारके रोकने की हम कोशिश करते हैं। यह हमारी असह