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स्वाधीनता।


अमुक राय या अमुक सम्मति निर्दोष है। इसलिए उस पर आक्षेप करने, उसके दोष दिखलाने, की जरूरत नहीं। वे कहते क्या हैं कि अमुक राय, अमुक बात, या अमुक निश्चय से समाज का फायदा है; इसलिए उसके विपय में खण्डनमण्डन करने बैठना व्यर्थ है। अर्थात् आदमी फायदे का तो खयाल करते हैं; पर झूठ-सच का नहीं। कोई कोई यह भी कहते हैं कि कुछ बातें ऐसी हितकर हैं यहां तक हितकर कि उनके बिना काम ही नहीं चल सकता-कि उनकी रक्षा करना, अर्थात् उनका खण्डन न होने देना, गवर्नमेण्ट का उतना ही फर्ज है जितना कि समाज के फायदे की और और बातों का लोप न होने देना है। बहुत आदमियों की यह राय है कि ऐसी बातें जो निहायत जरूरी हैं, और कर्तव्य के कामों से जिनका बहुत धना सम्बन्ध है, उनके सच होने के विषय में यदि पूरा पूरा निश्चय न भी हो, तो भी, बहुमत के आधार पर उनको जारी रखना और उनके अनुसार काम करना गवर्नमेण्ट का फर्ज है। गवर्नमेण्ट को उनके मुताबिक काररवाई करना ही चाहिए। ऐसे मौके पर भ्रान्तिशीलता का खयाल करना मुनासिब नहीं। कभी कभी इस बात के सप्रमाण सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि जो लोग यह खयाल करते हैं कि गवर्नमेण्ट को इस तरह के हितकारक नियमों को काम में न लाना चाहिए वे भले आदमी नहीं। वे बहुधा इस बात को साफ साफ कह भी डालते हैं कि यदि तुम भले आदमी होते तो कभी ऐसा न करते। वे यह भी समझते हैं कि ऐसे आदमियों को बुराई करने से रोकना, और जो कुछ वे करना चाहें उसे न करने देना, अन्याय नहीं। औरों के साथ ऐसा व्यवहार करना वे शायद अनुचित भी समझें; पर ऐसों के लाथ नहीं।

जो लोग ऐसा खयाला करते हैं उनकी दलीलों से यह मतलब निकलता है कि किसी विषय के वाद-विवाद को रोक देना उसके सच होने पर अवलम्बित नहीं रहता; किन्तु उसकी उपयोगिता पर अवलम्बित रहता है। अर्थात इस बात का विचार नहीं किया जाता कि वह विषय झूठ है या सच। विचार इस बात का किया जाता है कि वह उपयोगी है या नहीं; उससे कुछ काम निकल सकता है या नहीं। और यदि कुछ काम निकलने की सम्भावना है तो उसके विपय में विवेचना द्वारा झूठसच के मालम करने की अर्थात् किसीको उसके विरुद्ध बोलने देने की, जरूरत नहीं समझी जाती। इस तरह