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दूसरा अध्याय।

और उनके विषय में विचार करने की योग्यता बिलकुल ही नहीं रखते हैं। अच्छा, सौ में उस एक की योग्यता भी बहुत बढ़ी चढ़ी नहीं; वह भी अन्यसापेक्ष्य है; वह भी दूसरे की सहायता का मुहताज है। पुराने जमाने में हर पीढ़ी के कितने ही नामी आदमियों के कितने ही निश्चय, इस समय, भ्रान्तिमूलक सिद्ध हुए हैं—भूलों से भरे हुए प्रमाणित हुए हैं। उन्होंने खुद बहुतसे काम ऐसे किये या दूसरों के द्वारा किये गये बहुतसे ऐसे काम मंजूर कर लिए, जिनको इस समय, कोई भी न्यायसंगत नहीं कहता; कोई भी उचित नहीं बतलाता। फिर क्या कारण है जो, इस समय, सब कहीं युक्तिपूर्ण मतों और युक्तिपूर्ण व्यवहारों की इतनी अधिकता है? अर्थात्, क्यों लोग उन्ही बातोंको अधिक पसन्द करते हैं—क्यों उन्हीं व्यवहारों को अच्छा समझते हैं—जो युक्तिपूर्ण न्यायसङ्गत या उचित जान पड़ते हैं? इस तरह के विचारों की अधिकता का कारण, मेरी समझ में, मनुष्यके मन का एक धर्म्म विशेष है। अर्थात् मनुष्य के मनका स्वभाव या झुकाव ही ऐसा है कि उसे युक्तिसङ्गत बातें अधिक अच्छी लगती हैं। बुद्धिमत्ता और न्यायशीलता के सम्बन्ध में जितनी बातें आदमी में अच्छी देख पड़ती हैं उन सबका भी कारण मनुष्यका धर्म्म-विशेष या स्वभाव-विशेष है। यदि आदमियों की दशा बिलकुल ही नहीं बिगड़ गई; यदि उनका आचरण बिलकुल ही भ्रष्ट नहीं हो गया; तो इस तरह के धर्म्म की अधिकता का होना स्वाभाविक बात है। इस धर्म्म या इस स्वभाव का नाम मिथ्यात्वसंशोधन है। अपनी भूलों को दुरुस्त करनेकी तरफ मनुष्य की प्रवृत्ति आप ही आप होती है। मतलब यह कि विचार, विवेचना और तजरुबा के द्वारा भ्रममूलक बातोंका संशोधन करने की योग्यता मनुष्य में स्वभावसिद्ध है। भ्रांतिमूलक बातों का संशोधन या निराकरण सिर्फ तजरुबे ही से नहीं हो सकता। उसके लिए विवेचना और विचार की भी जरूरत नहीं रहती है। बिना विचार किये बिना विवेचना किये—यह नहीं जाना जा सकता कि तजरुबा किस तरह काम में लाया जाय। अर्थात् यदि खूब विवेचना न हो तो यह बात अच्छी तरह ध्यान में न आवे कि जो तजरुबा हआ है उससे किस तरह फायदा उठाया जाय और उसकी किस तरह योजना की जाय। भ्रान्तिमूलक बातें और व्यावहारिक रीतियां तजरुबा और विवेचना के जोर से धीरे धीरे दूर हो जाती हैं। परन्तु मन पर थोड़ा भी प्रभाव अर्थात् असर पैदा करने के लिए तजरुबे