यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३२
स्वाधीनता।


गलती कर सकता हूं; मैं भूल सकता हूं; तथापि बहुत कम आदमी उस भ्रान्तिशीलता से बचने के लिए कोई पेशबन्दी, पूर्वचिन्ता या प्रबन्ध करने की जरूरत समझते हैं। बहुत कम आदमियों के मन में यह बात आती है कि जिस विषय में उनको कोई सन्देह नहीं है, अर्थात् जिसे वे निधित जानते हैं, वह, सम्भव है, उनकी भ्रान्तिशीलता का ही उदाहरण हो। जो राजे स्वेच्छाचारी हैं अर्थात् जिनको किसी तरह का प्रतिबन्ध नहीं है; या जो लोग खुशामद करनेवालों से घिरे रहते हैं; या जिनकी आदत बेहद आहत होने की पड़ जाती है उनको, बहुधा सब विषयों में, यह निश्चय रहता है कि जो कुछ वे कहते हैं वह सर्वथा सच है। यह उनका दुर्भाग्य है। पर, कुछ लोग ऐसे हैं जो उनसे अधिक भाग्यशाली हैं; जिनकी स्थिति कुछ अच्छी है। ऐसे आदमियों को कभी कभी अपनी राय के खिलाफ विवेचना या बहस सुननेका मौका मिलता है। यदि उनकी राय--उनकी सम्मतिगलत होती है तो उसके विषय में दूसरों की की हुई समालोचना सुनकर उसे दुरुस्त कर लेने की उन्हें आदत रहती है। यह नहीं कि इस तरह की सिर्फ उन्हीं बातों को निर्विवाद, निश्चित और सच्ची समझते हैं जो बातें उन लोगों की बातों से मेल खाती हैं जिनका आदर करने की उन्हें आदत पड़ रही है या जो उन्हें हमेशा घेरे रहते हैं। क्योंकि केवल अपनी बुद्धि, या अपने ज्ञान, या अपनी विचारणा पर आदमी का विश्वास जितना कम होता है उतना ही संसार की प्रमादहीनता या निर्धमता पर उसका विश्वास अधिक होता है। यह एक साधारण नियम है। और हर आदमीका संसार उतना ही समझना चाहिए जितने से उसे काम पड़ता है। संसारके जिस हिस्से से उसका सम्बन्ध है वही उसका संसार है। अर्थात् उसका दल, उसका धर्म, उसका पन्थ, उसकी जाति--यही उसका संसार है। जो आदमी जिस युग या जिस देश में रहता है वह यदि उसे ही दुनिया मानता है, अर्थात् "दुनिया" या "संसार" शब्द का वह उतना ही व्यापक अर्थ समझता है, तो वह उसी परिमाण में उदारचरित या विशालचेता कहा जा सकता है। दूसरे युग, दूसरे देश, दूसरे पन्थ, दुसरे धर्म, दूसरे पक्ष और दूसरी जाति के आदमियों की राय मेरी राय से बिलकुल उलटी थी, या अब भी उलटी है, यह मालूम हो जाने पर भी, अपनी राय के विषय में आदमी का