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पहला अध्याय।


उस पक्ष के सामने यथा-नियम उत्तरदाता होते हैं जो सब से अधिक बलवान होता है। इस लिए, इतने ही से, सत्ताधारियों की शक्ति को एक उचित हद के भीतर रखने का माहात्म्य कम नहीं हो जाता। वह वैसा ही बना रहता है उसकी जरूरत नहीं जाती रहती। यह बात समझदार आदमियों की समझ में आ गई; यह सत उनको पसन्द आ गया। यही नहीं; किन्तु, बड़े बड़े लोगोंने, जो प्रजा की सत्ता को अपने सच्चे या काल्पनिक हित के प्रतिकूल समझते थे, इस मत को, योरप में, स्थापित भी कर दिया। इस समय तो राज्यशासन-सम्बन्धी शास्त्र के पण्डितों का सिद्धान्त ही यह हो गया कि अधिक मनुष्योंके समूह के अन्याय से बचने के लिए लोगों को उसी तरह सावधान रहना चाहिए जिस तरह और आपदाओं से बचने के लिए उनको रहना पड़ता है।

दूसरे जुल्मों की तरह, अधिक मनुप्योंके समूह के जुल्म से पहले सभी लोग उरते थे। वे समझते थे कि यह जुल्म, बहुत करके, सत्ताधारी अधिकारियों के द्वारा होता था। इस समय तक भी साधारण आदमियों की समझ ऐसी ही है। परन्तु समझदार आदमियों के ध्यान में यह बात आ गई कि जब जन-समुदाय खुद ही जुल्म करता है-अर्थात् बहुत से आदमियों का समूह, जिन आदमियों से दह बना है उन्हीं में से किसी किसी पर जुल्म करता है-तब जुल्म करने के साधन या सामान सिर्फ उसके सत्ताधारी अधिकारियों के ही हाथ में नहीं रहते; किन्तु, स्वयं उस समूह के भी हाथ में रहते हैं। जन-समृह हुक्म दे सकता है, अर्थात् कायदे कानून बना सकता है, और उनके अनुसार वह काररवाई भी कर सकता है। अतएव यदि कारले की जगह वह बुर कायदे कानून बनाने लगा; या ऐसी बातों के सम्बन्ध में उसने कानून बनाना आरम्भ किया जिनमें उसे दखल न देना चाहिए, तो उससे समाज पर जो जुल्म होता है वह सत्ताधारी हाकिमों के द्वारा किये गये कितने ही जुल्मों से अधिक भयंकर होता है। यह सच है कि प्रवल जनसमूह अर्थात् समाज, जो सजा देता है वह सजा इतनी कड़ी नहीं होती जितनी कि सरकारी हाकिमों की दी हुई सजा होती है; परन्तु समाज की दी हुई सजा, अर्धात जुल्म, का प्रभाव दूर तक पहुँचता है; जिन्दगी की होती सोटी बातों तक में उसका प्रदेश होता है; और उस से छुटकारा पाने का सौदा बहुत कम मिलता है। सरकारी जुल्म से सिर्फ शरीर ही को तक