पृष्ठ:स्वाधीनता.djvu/३०६

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मस्तक पर चढ़ाना चाहता हूँ, जिनकी न जाति का पता हो, न धर्म का, जो समाज के सजा़याफ़्ता हों, धर्म के ठुकराये हुए हों। वे कुछ ऐसे वहके हुए हों, कि मंदिर में नमाज पढ़ते हों, मसजिद में कीर्तन करते हों, गिरजे में भारती उतारते हों,। मैं तो अब ऐसे ही गुदड़ी के लालों की कदम- वोसी करना चाहता हूँ, जो तेरी खोज में शास्त्रार्थ को छोड़ चुके हों, तर्क-श्रृंखला को तोड़ चुके हों। जो राम और रहीम को, बुद्ध और ईसा को अपनी वेखुदी की मस्ती में एक ही नज़र से देखते हों, कितने होंगे ऐसे सच्चे भास्तिक? घृणितों और दलितों की सेवा ही जिनकी दृष्टि में ईश्वर- सेवा हो, कहाँ होंगे ऐसे सच सेवक ? जहाँ भी हों तेरे ऐसे दुलारे आत्म-संतोषी संत, मुझे भी वहीं भेज दे उनके पैर पलोटने के लिए, उन के चरणों की धूल अपनी पीर-भर आँखों में मलने के लिए।

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