पृष्ठ:स्वाधीनता.djvu/२९६

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हे अज्ञेय देव ! कितने वादों और कितने सम्प्रदायों- ने अपने-अपने दायरे में तुझे बाँध लेने का प्रयत्न किया, पर वाहरे खिलाड़ी ! साफ़ निकल गया, आजतक किसी के भी वन्धन में न आया । तुझे बाँधते-बाँधते वुद्धि ही खुद वध गई । तुझे छूने के लिए तर्क भी दौड़ते-दौड़ते लँगड़ाने लगा । ज्ञान का होश-हवास जाता रहा । दलील दब गई। वेद दाँतों उँगली दवाये रह गये, बेचारे 'नेति नेति' ही कहते रहे ! शास्त्रों को तो अनेक वार मुँह की खानी पड़ी। संप्रदायों की आँखें तिलमिला गई। मजहबों की भी तेरे आगे एक न चली । इन सबोंने तेरी नई-से-नई रिसर्च की और अवभी करते ही जा रहे हैं, पर कुछ पूरा नपड़ा। जब किसी जान- कार से पूछा, कि खुदा के बारे में उसने अपने इल्म से क्या जाना, तो जवाब मिला-