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स्वाधीनता।


कारण, मजदूरी का निर्ख कम कर देना मानो उन सब लोगों का बहुत बुरा अपराध करना है जो मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। योरप किसी किसी देश में यह कायदा है कि जब तक वधृ-वर इस बात को समाण नहीं साबित कर देते कि भावी सन्तति के पालन पोषण के लिए उसके पास उचित साधन है तब तक उन्हें विवाह करने की अनुमति नही है। गवर्नमेण्ट के जो कर्तव्य हैं उन्हींमें से यह भी एक है अर्थात् यह उन्हींके भीतर है, बाहर नहीं। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि इन कायदे को जारी करके―इस कानून को अमल में लाकर―गवर्नमेंट अपने कर्तव्यों का अतिक्रमण किया। इस तरह के कायदे समाज की दर और समाज की राय के अनुसार सुभीते के हों या न हों; तथापि गवर्नमेंट को कोई यह दोप नहीं दे सकता कि उसने लोगों की स्वतंत्रता में अनुचिरीति पर दस्तंदाजी की। यह एक ऐसा कायदा है―यह एक ऐसा नियम है―कि इसके जारी होने से उन बातों का प्रतिबन्ध होता है जिनसे समाज के अहित होने का डर रहता है। अतएव इसमें गवर्नमेण्ट की दस्तंदाजी बहुत मुनासिब है पर, यदि, किसी विशेष कारण से गवर्नमेंट के द्वारा इस तरह का कानून बनाया जाना मुनासिब न समझा जाय तो भी दण्डनीय व्यति को सामाजिक दण्ड जरूर ही मिलना चाहिए―उसकी छी थू जरूर ही होनी चाहिए। परन्तु स्वाधीनता के सम्बन्ध में आज कल लोगों के विचार बड़े ही विलक्षण हो रहे हैं। जो बातें आत्म-सम्बन्धी हैं, अर्थात जिनका सम्बन्ध दूसरों से बिलकुल ही नहीं है, उनके विषय में यदि किसी की स्वतंत्रता का कोई उल्लंघन करे तो लोग ऐसे उल्लंघन को वरदाश्त भी कर लेते हैं। परन्तु जिन वासनाओं―जिन मनोविकारों―की तृप्ति से, उचित साधन न होने के कारण, भावी सन्तति को अनेक दुःखों और दुर्गुणों में उम्र भर लिप्त रहना पड़ता है, और उससे सम्बन्ध रखनेवाल लोगों को भी सैकड़ों आपदाओं का सामना करना पड़ता है, उनके प्रतिबन्ध की यदि कोई जरा भी कोशिश करता है तो लोग उसे जिलकुल ही नहीं बरदाश्त कर सकते। स्वतंत्रता का कहीं तो इतना आदर और कहीं इतना अनादर! इस तरह का परस्पर विरोध बहुत ही आश्चर्यजनक है। जिन लोगों के विचार इतने परस्परविरोधी हैं उनकी तुलना करने से यह सिद्वान्त निकलता है कि उन्हें दूसरे आदमियों को हानि पहुँँचाने का तो