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स्वाधीनता।


मोल नहीं ले सकते। यह उनके लिए मनाई के ही बराबर है। इस कारण गवर्नमेंट का यह धर्म है कि कर लगाने के पहले वह इस बात का अच्छी तरह विचार करले कि किन चीजों के बिना लोगों का काम चल सकता है और किनके बिना नहीं चल सकता। जिन चीजों का एक नियमित मात्रा से अधिक उपयोग करने से लोगों की हानि होने का निःसन्देह डर हो उन पर अधिक कर लगाना गवर्नमेंट का कर्तव्य है। अतएव नशे की चीजों पर कर लगाकर यदि गवर्नमेंट को अपनी आमदनी बढ़ाने की जरूरत हो तो जितने कर से गवर्नमेंटका काम होता हो उतना कर लगाना उचित ही नहीं, किन्तु प्रशंसनीय भी है।

यहां पर एक और बात का विचार करना है। वह यह कि नशे की चीजों को न्यूनाधिक परिमाण में बेचने का पूरा पूरा हक कुछ ही आदमियों को देना चाहिए या नहीं। इसका जवाब उस काम के अनुसार होगा जिसके खयाल से बेचने का प्रतिबन्ध किया गया होगा। अर्थात् जैसा काम होगा वैसा ही जवाब भी होगा। जहां सब लोगों की आमद रफ्त रहती है― अर्थात् जो सार्वजनिक जगहें हैं―वहां पुलिस रखने की जरूरत होती है। पर जहां मादक पदार्थ, अर्थात् नशे की चीजें, बिकती हैं वहां तो पुलिस की और भी अधिक जरूरत होती है; क्योंकि समाज के विरुद्ध जो अपराध होते हैं उनका बीज बहुत करके ऐसी ही जगहों में बोया जाता है―वहीं ऐसे अपराधों की अधिक उत्पत्ति होती है। अतएव नशे की चीजों के बेचने का अधिकार सिर्फ उन्हीं लोगों को चाहिए जो सभ्य और अच्छे चालचलन के हैं और जो अपनी भलमंसी की जमानत दे सकते हैं। यदि बिकने की जगह पर ही लोग ऐसी चीजें खर्च करते हों तो इस बात का खयाल रखना और भी जरूरी बात है। दूकान खोलने और बन्द करने का ऐसा समय नियत कर देना मुनासिब होगा जिसमें निगरानी रखनेवाले अफसर, या पुलिस के अधिकारी, अच्छी तरह देख भाल कर सकें। दुकानदार के अयोग्य होने, या जान बूझकर उसके आंख छिपाने, से यदि बार बार झगड़े फसाद हों, या जुर्म करने के इरादे से वहां लोग इकट्ठे हों, तो नशे की चीजों के बेचने का लाइसंस छीन कर दूकान बन्द कर देना चाहिए। इससे अधिक और कोई प्रतिबन्ध करना, मेरी समझ में तत्त्वद्दष्टि से अन्याय होगा। एक उदाहरण लीजिए। शराब पीने के लालच को घटाने, और शराब की दुकानों तक