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स्वाधीनता।


मैदान जुआ खेलना मना करने से और लोग इस बुरी आदत से बचते हैं समाज को इतना ही फायदा काफी समझना चाहिए। इसके आगे जाने की उसे अधिकार भी नहीं। यह दूसरे पक्षवालों की दलील हुई। यह दलील बहुत मजबूत है―खूब सबल है। परन्तु यह कहने का साहस मैं नहीं कर सकता कि इस दलील के आधार पर मुख्य अपराधी को छोड़ देना और अपराध करने की उत्तेजना देनेवाले को सजा देना मुनासिब होगा। इसे स्वीकार करने में अन्याय होता है―बात नीतिविरुद्ध हो जाती है। इस दलील के अनुसार काररवाई करने से कुटनापन करनेवाले को सजा होगी, पर व्यभिचार करनेवाला साफ छूट जायगा। इसी तरह जुआ-घर खोलने वाला पकड़ा जायगा, पर जुआ खेलनेवाला बच जायगा। इसी से इस विषय को अभी विवादास्पद रहने देना ही अच्छा होगा। इस दलील के आधार पर क्रय-विक्रय के मामूली व्यापार में दस्तंदाजी करना―अर्थात् किसी चीज के बेचने या मोल लेने की मनाई कर देना―और भी अधिक अनुचित बात होगी। जितनी चीजें बाजार में बिकती हैं उनको बहुत अधिक खाजाने से नुकसान होने का डर रहता है। परन्तु बेचनेवाला हमेशा यही चाहता है कि उसकी विक्री बढ़े और लोग उन चीजों को खूब खायँ। अर्थात् वह विकी हुई चीजों के दुरुपयोग को उत्तेजित करता है। पर इस आधार पर शराब की विक्री बन्द कर देना कभी उचित नहीं हो सकता। क्योंकि अधिक शराब पी कर उसका दुरुपयोग करनेवालों को उत्तेजन देने में यद्यपि दुका- नदारों का फायदा है, तथापि जो लोग शराब का सदुपयोग करते हैं, अर्थात उसे अच्छे काम में लगाते हैं, उनके लिए इन दुकानदारों की जरूरत भी है। परन्तु दुरुपयोग करनेवालों को जो ये लोग उत्तेजना देते हैं उससे समाज की हानि जरूर होती है। यह हानि समाज के लिए बहुत ही अनिष्टकारक है। इससे ऐसे दुरुपयोग को बन्द करने के लिए दुकानदारों से जमानत लेना या इकरारनामा लिखाना बहुत मुनासिव है। इस तरह के वन्धन से दुकानदारों की स्वतंत्रता में दस्तंदाजी नहीं होती। पर, हां, यदि इस तरह के बन्धन से समाजका कोई फायदा न होता तो उसकी गिनती दस्तंदाजी में जरूर होती।

यहां पर एक और प्रश्न उठता है। वह यह है कि जो काम कर्ता के लिए हानिकारक है उसे ही यदि वह चाहे, और उससे किसी दूसरे के