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चौथा अध्याय

आदमी ने इस तरह के कर्तव्य-पालन में जरा भी गलती की उसने मेरे सामाजिक हक में बाधा डाली। इससे उसको दूर करने के लिए कानून बन- वाने का मुझे पूरा अधिकार है। स्वाधीनता से सम्बन्ध रखनेवाली किसी एक आध बात में दस्तंदाजी की अपेक्षा यह राक्षसी सिद्धान्त-यह अनोखा नियम-बहुत ही अधिक भयङ्कर है। यह सिद्धान्त ऐसा है कि इसके माधार पर कोई स्वाधीनता का चाहे जितना, और चाहे जैसा उल्लंघन करे वह सभी न्यायसङ्गत माना जा सकेगा। इस सिद्धान्त के अनुयायियों को स्वाधीनता-सम्बन्धी एक भी हक कुबूल नहीं । हां, किसी राय को जाहिर न करके उसे मन ही में रखने का हक शायद इनके इस अनूठे सिद्धान्त के पने से बचे तो बचे । क्योंकि ज्यों ही कोई राय किसी के मुँह से निकलेगी स्यों ही लोग, इस सिद्धान्त के आधार पर, फौरन ही कह उठेंगे कि हमारे सारे सामाजिक हकों पर हमला हुआ। इस महा विलक्षण सिद्धान्त से यह भी अर्थ निकलता है कि मनुष्य मात्र को हर आदमी की नैतिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति तक में दस्तंदाजी करने का अधिकार है; और हर आदमी को-हर हकदार को-अपनी अपनी तबीयत के अनुसार अपने अपने अधिकार का लक्षण बतलाने का भी हक है।

लोगों की उचित स्वतंत्रता में अनुचित रीति पर दस्तंदाजी करने का एक और उदाहरण सुनिए। यह उदाहरण ऐसा वैसा नहीं है-बड़े महत्व का है। यह रविवार-सम्बन्धी कानून है । इसके जारी करने का सिर्फ डर ही नहीं दिखाया गया; यह बहुत दिनों से जारी भी है; और इसके जारी होने में समाज अपनी बहुत बड़ी जीत भी समझता है । यदि सांसारिक जीवन- याना में किसी तरहका विघ्न न भाता हो तो सब काम छोड़ कर हफ्ते में एक दिन धाराम करने की, यद्यपि यहदियों के धर्म को छोड़ कर आर किसी धर्म की आज्ञा नहीं-अर्थात् यद्यपि धर्मसम्बन्धी इस तरह का कोई स्मृ- 'तिवाक्य नहीं है-तथापि यह रीति बहुत लाभदायक है । इसमें कोई लन्दह नहीं। पर जितने श्रमजीवी है-जितने आदमी मेहनत-मजदूरी करके आएना पेट पालते हैं जब तक इस कायदे की पाबन्दी न करेंगे तब तक यह अमल में नहीं जा सकता। अतएव इतवार के दिन, और लोग, अप- हना कामकाज जारी रखकर मेहनत मजदूरी करनेवालों का नुकसान न करें, और उनको भी इतवार की परवा न करके, अपना अपना व्यवसाय करते

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